रामनगर। बिन रोशनी, ध्वनि विस्तारक यंत्र के रूप-सज्जा और सादगी भरे अभिनय के लिए मशहूर रामलीला में रविवार को ‘वशिष्ठ सभा’, चित्रकूट में ‘जनकागमन’ तथा ‘सभा’ लीला का भावपूर्ण मंचन रामबाग पोखरा कुतलूपुर के पास हुआ। लीला देखने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ इस कदर उमड़ी कि पीएसी तिराहे से रामबाग, दुर्गा मंदिर और आसपास का स्थल पटा रहा।
लीला के दृश्य में मुनि वशिष्ठ कहते हैं कि हे राम आप प्राणों के प्राण और परम परमात्मा हो। सब आप के बिना दुखी और आप से सुखी होते हैं। आप ही सुखों की खान, दया के निधान हो। महर्षि वशिष्ठ भगवान को सहज स्नेह के साथ अभिभूषित करते हैं। श्रीराम मुनिवर को प्रणाम कर आश्रम को जाते हैं।
भरत स्नान -ध्यान के बाद भगवान राम के समीप बैठते हैं । तभी वशिष्ठ जी भरत को बुलाते हैं। सबको बैठा कर कहते हैं, श्रीराम आप का सब के हृदय में वास है। भरत को समझाते हैं। हे तात व्यर्थ की ग्लानियों से कुछ होने वाला नहीं है। श्रीराम का स्नेह तुम्हारे साथ है। भगवान श्रीराम भरत जी का स्नेह देख बृहस्पति देवताओं से कहते हैं कि अपना मन स्थिर करो कोई डर नहीं। भरत जी को राम जी की परछाई जानो।
इस बीच जनकदूत का आगमन होता है। वशिष्ठ जी जनकदूत से विदेहराज की कुशलता पूछते हैं। जनक जी का आगमन सुन श्रीराम जी समाज सहित चलते हैं। उन्हें आदर सहित आश्रम ले जाते हैं। जनकजी सीता से कहते हैं - हे पुत्री तुमने पिता का कुल और सास का कुल दोनों को पवित्र रखा। वशिष्ठ जी ज्ञान भरा उपदेश सुनाते हैं। फिर भगवान राम उन्हें प्रणाम कर आश्रम चले जाते हैं।
जनकजी सोचने लगे कि उन्होंने यहां आकर अच्छा नहीं किया है। महाराज दशरथ ने श्रीराम को वन जाने को कहकर अपने प्रेम को सच साबित कर दिया। फिर उन्हें भी यहां नहीं आना चाहिए था। सोच में डूबे महाराज जनक भरत से कहते हैं कि आप पूज्य पिता के समान हैं । सभी वहां भगवान राम के पास पहुंचते हैं। भ्राता भरत की व्याकुलता देख श्रीराम अधीर हो उठते हैं। भावुक हो कर उन्हें समझाते हैं। उनकी प्रेम वाणी सुनकर देवतागण भी मुग्ध हो जाते हैं। सभी के मन में प्रसन्नता छा जाती है। सबके संकट दूर हो जाते हैं। इसी के साथ लीला का समापन हो जाता है ।