वीडीए के पत्र से खुला फर्जीवाड़ा
जमीन को लेकर कई सालों से विवाद चल रहा है। एक पक्ष इस जमीन पर मालिकाना हक का दावा करता है। लिहाजा, मंडलायुक्त ने तहसील से फाइल तलब कराई। इसमें पता चला कि विकास प्राधिकरण ने अधिग्रहण की सूचना का एक पत्र वर्ष 2005 में तहसील भेजा था। इस पत्र के आधार पर विकास प्राधिकरण की फाइलें खंगाली गईं तो जमीन के अधिग्रहण की फाइल भी सामने आ गई। इसमें मुआवजा भुगतान कर अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी कराने की जानकारी है।
तहसील और एसएलओ की भूमिका की जांच
जमीन के इस खेल में विशेष भूमि अध्याप्ति अधिकारी कार्यालय और सदर तहसील की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। अधिग्रहण के बाद जमीन को कागजों में अंकित नहीं करने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की जांच होगी। इसके लिए मंडलायुक्त ने अपर मंडलायुक्त प्रशासन को जांच सौंपी है। माना जा रहा है कि 2002 से लेकर 2005 के बीच इस जमीन पर फर्जीवाड़े का खेल किया गया है।
सुबह जारी हुआ परवाना, रात में दर्ज हुआ नाम
जांच में जमीन के मालिकाना हक में फर्जीवाड़े का खुलासा होने के बाद मंडलायुक्त के निर्देश पर महानगर पालिका वाराणसी को जमीन का मालिकाना हक दिया गया है। बृहस्पतिवार सुबह परवाना जारी कराकर उसे तहसील भिजवाया गया और रात में खसरा खतौनी में इसे दर्ज कराया गया। इसी आधार पर अब परवानों की जांच कराई जा रही है। इसमें बड़े फर्जीवाड़े के खुलासे की संभावना है।
रविंद्रपुरी की गुरुधाम कॉलोनी में 10 एकड़ से ज्यादा जमीन को विकास प्राधिकरण ने अधिग्रहित किया था, मगर कागजी हेराफेरी कर इस पर मालिकाना हक नहीं बदला गया। जांच में इस फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ है। पूरे मामले की विस्तृत जांच कर इसमें शामिल लोगों पर कार्रवाई होगी।
दीपक अग्रवाल, मंडलायुक्त