यूपी विधानसभा चुनाव में वोटरों के मूड को कहीं बरकरार रखने तो कहीं बदलने की जंग है। वोटर कभी बदलाव की आहट दे देते हैं, तो कभी निरंतरता का संकेत। भाजपा के लिए चुनौती है कि पिछले चुनाव के नुकसान की भरपाई 2017 या 2022 जैसे नतीजे लाकर कर दे।
उत्तर प्रदेश में एनडीए 2024 के लोकसभा चुनाव में बने वोटरों के उस मूड को पूरी तरह बदलना चाहता है जिसने उसे पीछे कर दिया था। तो वहीं इन नतीजों से उत्साहित गठबंधन की कोशिश अगले साल होन वाले विधानसभा चुनाव में बरकरार रखते हुए और आगे निकलने की कोशिश में है।
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राज्य में यह दोनों गठबंधन अपनी-अपनी राजनीतिक कमेस्ट्री दुरुस्त करने में लगे हैं। 2024 के नतीजे इस बात का संकेत नहीं करते कि अब आने वाले विधानसभा चुनाव में किसे पूर्ण बहुमत मिलेगा। भले ही इंडिया गठबंधन उम्मीदें पाले हो।
यूपी में 2024 के लोकसभा चुनावों के नतीजों को अगर विधानसभा सेगमेंट के हिसाब से देखा जाए तो उस वक्त सपा 403 में 184 पर, कांग्रेस 39 पर व एनडीए 174 पर आगे था। इस आधार पर किसी को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता है। भाजपा के लिए चुनौती है कि पिछले चुनाव के नुकसान की भरपाई 2017 या 2022 जैसे नतीजे लाकर कर दे।
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वोट प्रतिशत में बदलाव का खेल
सपा कांग्रेस गठबंधन भले ही 43 सीट जीत कर सबसे आगे हो गया लेकिन वोट प्रतिशत में वह भाजपा गठबंधन से पीछे रहा। हालांकि यह अंतर मामूली है। पर इससे सीट की जीत हार में अहम भूमिका हो जाती है। ज्यादा वोट प्रतिशत हासिल करने के बाद भी सीट उस हिसाब से नहीं आ पाती। विशेषज्ञ मानते हैं कि किसी पार्टी का जनसमर्थन सभी विधानसभा क्षेत्रों या अधिकांश में प्रभावी व मुखर हो तो सरकार बनने की प्रबल संभावना रहती है।
ऐसे बदलता है वोटरों का मूड
जब 2004 के लोकसभा चुनाव में सपा को सबसे ज्यादा 35 सीटें 26.74 प्रतिशत व बसपा को 9 सीटें व 12.04 प्रतिशत वोट मिला लेकिन 2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने पूर्ण बहुमत की सरकार बना ली। यानी नतीजे पलट गए। 2009 के आम चुनाव में सपा सबसे ज्यादा 23 सीट व बसपा सबसे ज्यादा 27.42 प्रतिशत वोट पाई। 2012 में वोटरों ने विधानसभा चुनाव में सपा को पूर्ण बहुमत दे दिया।
2014 में भाजपा 71 सीटें व 42.13 प्रतिशत वोट पाकर सबसे आगे निकल गई। भाजपा को यूपी में मिला बहुमत 2017 के विधानसभा चुनाव में बरकरार रहा। यह रुझान 2019 के लोकसभा व 2022 के विधानसभा में भाजपा के लिए दिखा। खास बात यह कि 2012 में पूर्ण बहुमत पाकर सरकार बनाने वाले सपा की दो साल बाद लोकसभा चुनाव में केवल पांच सीटें देकर जनता ने बड़े बदलाव का संकेत दे दिया था।
यूपी में कांग्रेस का ग्रेडिंग सिस्टम, काम की माह में एक बार केंद्रीय नेतृत्व करेगा समीक्षा
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस संगठन को सक्रिय बनाए रखने के लिए आलाकमान ने सख्त ग्रेडिंग सिस्टम लागू किया है। इसके अलावा प्रतिभा खोज से आए नेताओं की अलग से एक सूची बनाई है, जो कि निष्क्रिय जिला अध्यक्षों का स्थान लेंगे। इतना ही नहीं संगठन को मजबूत करने के लिए राहुल और प्रियंका स्वयं सचिवों का साक्षात्कार कर रहे हैं।
जिला अध्यक्षों को काम के आधार पर मिलेगा ए, बी, सी ग्रेड
इसमें अब तक 39 सचिवों का इंटरव्यू हो चुका है। एआईसीसी के संगठन सृजन अभियान के अंतिम चरण में जिला, मंडल और ब्लॉक अध्यक्षों को एबी और सी वर्ग में बांटा जाएगा। सी कैटेगरी में आने वाले यानी निष्क्रिय अध्यक्षों को नोटिस देकर हटाया जाएगा।
इसी मॉडल पर यूपी में जिला अध्यक्षों की नई सूची जारी होने वाली है। माना जा रहा है कि पार्टी ने द्वितीय श्रेणी के नेताओं की पक्ति निर्माण कर लिया है। इसके तहत प्रतिभा खोज से आए युवा चेहरों को सी ग्रेड वाले अध्यक्षों की जगह मौका दिया जाएगा, ताकि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले संगठन जमीन पर सक्रिय दिखे।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक संगठन के कामकाज की निगरानी के लिए एआईसीसी सचिवों को अब अपने प्रभार वाले राज्य में महीने के 15 से 20 दिन रहना अनिवार्य कर दिया गया है।