उन्नाव। 13 साल लंबी कानूनी लड़ाई के बाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच ने लोअर कोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया जिसमें आरोपी को अपहरणकर्ता बता उसे दोषी ठहराते हुए पांच साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई थी। दोषी के अधिवक्ता ने उच्च न्यायालय में साल 2013 में लोअर कोर्ट के आदेश के खिलाफ क्रिमिनल अपील दाखिल की थी।
हसनगंज कोतवाली क्षेत्र के एक गांव निवासी पिता ने साल 2011 में गांव में रहने वाले मोनू उर्फ राघवेंद्र तिवारी, उसके सहयोगी कमलेश के खिलाफ नाबालिग बेटी को साथ ले जाने की प्राथमिकी दर्ज कराई थी। तलाश कर रही पुलिस ने कुछ दिनों बाद किशोरी को बरामद कर लिया था। न्यायालय के समक्ष उसका कलमबंद बयान दर्ज कराया था। किशोरी ने आरोपी मोनू उर्फ राघवेंद्र पर दुष्कर्म करने की बात कही थी। मुकदमे की विवेचक ने आरोपी मोनू उर्फ राघवेंद्र तिवारी पर दुष्कर्म की धारा बढ़ाते हुए मुखबिर की सूचना पर उसे गिरफ्तार कर जेल भेजा था। पर्याप्त साक्ष्यों को जुटाते हुए विवेचक ने न्यायालय में मोनू उर्फ राघवेंद्र के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया था। दो सालों तक चली सुनवाई के दौरान 11 जनवरी 2013 को न्यायाधीश जगदीश प्रसाद चतुर्थ की न्यायालय से आरोपी मोनू उर्फ राघवेंद्र को दुष्कर्म में दोषी ठहराते हुए पांच साल के कारावास और पांच हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई थी। न्यायालय से दोषी मोनू उर्फ राघवेंद्र को जेल भेजा गया था। न्यायालय के फैसले को दोषी ने चुनौती दी और अधिवक्ता के माध्यम से उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच में क्रिमिनल अपील दाखिल की थी। 13 साल तक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद आठ मई 2026 को न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने सुनवाई के बाद लोअर कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए दोषी मोनू उर्फ राघवेंद्र को गुणदोष के आधार पर बाइज्जत बरी कर दिया।