उन्नाव। संस्कृत विद्यालयों में पढ़ाई जाने वाली देव भाषा सरकार उपेक्षा कर रही है। एक स्नातकोत्तर व एक माध्यमिक विद्यालय को छोड़कर सात अन्य संस्कृत विद्यालयों में न तो बाबू हैं और न ही चपरासी। पर्याप्त टीचर भी नहीं हैं। सरकारी सुविधा के नाम पर अध्यापकों को सिर्फ वेतन ही मिलता है। विद्यालयों के रखरखाव व दूसरी अन्य व्यवस्थाओं के लिए सालों से कोई बजट जारी नहीं किया गया। प्रधानाचार्य पढ़ाई के साथ-साथ बाबू व चपरासी का भी कार्य कर रहे हैं। इसमें तीन माध्यमिक विद्यालय वित्त विहीन हैं और चार सहायता प्राप्त संचालित हैं। अव्यवस्थाओं के शिकार इन विद्यालयों में इसके बाद भी छात्रों की संख्या में बढ़ोतरी देखी जा रही है।
जिले में नौ संस्कृत विद्यालय संचालित हैं। इसमें शिव प्रसाद स्नातकोत्तर महाविद्यालय उन्नाव व सीताराम जयराम संस्कृत महाविद्यालय सुमेरपुर हैं। अन्य विद्यालय माध्यमिक स्तर तक संचालित हैं। शिव प्रसाद स्नातकोत्तर महाविद्यालय में आठ टीचरों की जरूरत है लेकिन सिर्फ पांच का ही स्टाफ है। इसमें एक प्रधानाचार्य सहित दो टीचर और एक बाबू भी शामिल है। प्राचार्य संध्या सिंह का कहना है कि पर्याप्त टीचर न होने से शिक्षा व्यवस्था कैसे सुधारी जा सकती है। यही हाल सीताराम जयराम एंग्लो संस्कृत महाविद्यालय सुमेरपुर डिग्री कालेज का है। यहां शासन से चार पद स्वीकृत हैं, लेकिन विद्यालय में सिर्फ दो का ही स्टाफ है। यहां के प्राचार्य सुनील कुमार शुक्ला ने बताया कि विद्यालय में सिर्फ एक टीचर है वही पढ़ाता भी है और विद्यालय के कार्य से बाहर भी जाता है। इसका असर पढ़ाई पर पड़ रहा है।
माध्यमिक विद्यालयों की स्थिति.
वित्त विहीन विद्यालय..
1- देवीदत्त संस्कृत पाठशाला रावतपुर के प्रधानाचार्य दिनेश बाजपेई ने बताया कि विद्यालय में नौ कर्मचारी कार्यरत हैं इसमें एक बाबू, एक चपरासी व छह टीचर हैं। उन्हें शासन की ओर से कोई धनराशि नहीं मिलती।
2- गणेश संस्कृत माध्यमिक विद्यालय पाटन के प्रधानाचार्य रघुबीर सिंह का कहना है कि विद्यालय में सिर्फ तीन टीचर हैं जबकि आवश्यकता पांच की है। बाबू, चपरासी भी नहीं है इससे यह कार्य भी करना पड़ता है।
3- श्री प्रतापेश्वर संस्कृत विद्यालय चैनखेड़ा मवई के प्रधानाचार्य रामफेर सिंह का कहना है कि विद्यालय में बाबू, चपरासी नहीं है। शिक्षा का स्तर भी गिरता जा रहा है। जब तक विद्यालय में स्टाफ नहीं होगा पढ़ाई कैसे कराई जा सकती है।
सहायता प्राप्त विद्यालय..
1- कृष्ण भूषण वेद वेदांत विद्यालय बांगरमऊ के प्रधानाचार्य केशव अगिभनहोत्री का कहना है कि विद्यालय में पांच की जगह सिर्फ तीन टीचर पढ़ा रहे हैं। बाबू व चपरासी भी नहीं है। इससे यह भी कार्य करना पड़ता है। शासन से वेतन तो मिलता है लेकिन स्टेशनरी से लेकर अन्य सभी कार्य अपने पास से ही कराने पड़ते हैं।
2- श्री झाण्डेश्वर सामवेद संस्कृत विद्यालय बड़ौरा के प्रधानाचार्य लक्ष्मीकांत शुक्ला का कहना है कि आवश्यकता पांच टीचरों की हैं जबकि कार्यरत दो ही टीचर हैं। बाबू व चपरासी भी नहीं है। शासन से कोई ग्रांट भी नहीं मिलती ऐसे में स्तर कैसे सुधारा जा सकता है।
3- संस्कृत विद्यालय मौरावां के प्रधानाचार्य शिवपूजन पाठक का कहना है कि विद्यालय में उनके अलावा न तो टीचर हैं और न ही बाबू व चपरासी। बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ सभी कार्य वही देखते हैं। जबकि आवश्यकता पांच टीचरों की है।
4- श्रीराम संस्कृत पाठशाला देवारा के प्रधानाचार्य वीरेंद्र सिंह का कहना है कि विद्यालय में प्रधानाचार्य को मिलाकर तीन लोग कार्यरत हैं। इसमें दो टीचरों का कोर्ट केस चल रहा है। विद्यालय में न तो बाबू है और न ही चपरासी। विद्यालय में आवश्यकता चार टीचरों की है।