हंस के संपादक और वरिष्ठ कथाकार राजेंद्र यादव का जाना इलाहाबाद के साहित्यिक जगत को भी आहत कर गया। यादों को संजोते हुए नई और पुरानी पीढ़ी के रचनाकारों ने साहित्य में उनके सार्थक हस्तक्षेप को रेखांकित किया।
वरिष्ठ कथालेखिका प्रोफेसर अनिता गोपेश ने कहा, वह विवादप्रिय होने के बावजूद बहुत प्रेरणादायक व्यक्ति थे। उन्होंने ‘हंस’ के माध्यम से नए कहानीकारों को जगह दी। उनका संपादकीय कमाल का होता था।
उन्होंने साहित्य में स्त्री और दलित विमर्श को जगह दी। वरिष्ठ कथाकार असरार गांधी ने कहा, वह रचनाकारों के बहुत अच्छे दोस्त, जिंदादिल इंसान और कमाल के कथाकार, संपादक थे।
वरिष्ठ आलोचक और जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय सचिव प्रणय कृष्ण ने कहा, साहित्य की सबसे जीवंत शख्सियत जिससे दोस्ती और प्रतिद्वंद्विता दोनों प्यारी थी, के निधन से बड़ी क्षति हुई।
नई कहानी आंदोलन के महत्वपूर्ण स्तंभ होने के साथ ही हंस के संपादक के रूप में उन्होंने दूसरी यादगार पारी खेली जिसमें उन्होंने गहरी सामाजिक बहसें छेड़ीं। उनका आग्रह रहा कि अस्मिताओं के साहित्य को नई प्रगतिशीलता माना जाए। वह यारों केयार थे, जो उनसे लड़ते थे, वह मोहब्बत भी करते थे।
प्रगतिशील लेखक संघ की कार्यकारी सचिव संध्या नवोदिता ने कहा, इस सूचना ने हिंदी जगत को स्तब्ध कर दिया है। उन्होंने साहित्य में एकाधिकार को जिस ठसक के साथ चुनौती दी और नए रचनाकारों को स्थापित किया, वैसे हिंदी जगत में पहले कभी नहीं हुआ।
प्रलेस अध्यक्ष प्रो संतोष भदौरिया, प्रो एए फातमी, उर्मिला जैन, महेंद्र राजा जैन, नंदल हितैषी, अशफाक हुसैन, नीलम शंकर आदि ने कहा, बेबाक संपादक और बेलाग लेखक का जाना अपूरणीय क्षति है।
जनवादी लेखक संघ के अध्यक्ष हरीशचंद्र पांडेय और सचिव संतोष चतुर्वेदी ने भी उनके निधन को हिंदी साहित्य की अपूरणीय क्षति बताया। कहा, उनके निधन से नई कहानी आंदोलन का प्रमुख अध्याय समाप्त हो गया। हंस के माध्यम से उन्होंने कई महत्वपूर्ण विमर्शों को साहित्यकारों के बीच चर्चा का विषय बना दिया।
शेष रहेंगी यादें-मुलाकातें
बहुत अच्छा मित्र, अच्छा इंसान
जब मैं आगरा में था, तभी से वह मेरे मित्र थे। उनसे पारिवारिक संबंध था। अपनी शादी के पहले राजेंद्र और मन्नू दोनों ही इलाहाबाद वाले मकान पर आया करते थे। उनके जाने से साहित्य का बड़ा नुकसान हुआ। वह बहुत अच्छे संपादक, साथी और साहित्यकार थे। वह बहुत जीवंत व्यक्ति थे। वह जहां रहते थे, पूरी महफिल सज जाती थी। उन्होंने कई नए रचनाकारों को प्रोत्साहित किया।
अमरकांत
प्रख्यात कथाकार, ज्ञानपीठ से सम्मानित
साहित्य की यमुना का कन्हैया
वह प्राय: अश्क जी के यहां आते थे या फिर कोलकाता आते-जाते हुए इलाहाबाद रुकते थे। न सिर्फ हिंदी कहानी बल्कि दलित और स्त्री विमर्श को साहित्य के केंद्र में रखना उनका सबसे बड़ा योगदान है। वह सेकुलर और मेधावी संपादक थे। वह किसी को भी चुनौती दे सकते थे चाहे भगवान ही क्यों न हों। उन्होंने जिन नए कहानीकारों की फौज तैयार की, उन्होंने हिंदी कहानी में जगह बनाई। मैं तो कहूंगा साहित्य की जमुना का कन्हैया चला गया, वह यमुना किनारे रहते भी थे।
रवींद्र कालिया
वरिष्ठ कथाकार और संपादक, नया ज्ञानोदय
साफगोई पसंद, जिंदादिल शख्स
अपने साथ के लोगों को जाते हुए देख कर लगता है कि अकेले पड़ गए हैं। उन्होंने हिंदी जगत को जीवंत रखा और जानबूझ कर विवादों में रहकर लोगों को झकझोरा। अस्वस्थता के बावजूद वह निरंतर सक्रिय रहे। इलाहाबाद आने पर वह कई बार मेरे करेलाबाग वाले मकान पर रुकते थे। एक बार उन्होंने पूछा था, जो बच्चे पर अनुशासन करे, उससे शादी की जा सकती है, तब मुझे नहीं पता था कि उनका मन्नू जी से प्रेम है। वह बहुत साफगोई पसंद और जिंदादिल इंसान थे।
शेखर जोशी
वरिष्ठ कथाकार
विवादप्रिय ही नहीं लोकप्रिय भी
बतौर कहानीकार वह नई कहानी के दायरे से भले ही बाहर नहीं आ पाए लेकिन हंस के संपादक के रूप में उनका योगदान महत्वपूर्ण है। उनकी ओर से जो बहसें चलाई गईं, वह चौंकाने वाली होती थीं। वह समाज की जड़ता को दूर करने के लिए बराबर सक्रिय रहे। हिंदी समाज में वह सबसे ज्यादा विवादप्रिय और लोकप्रिय थे। आखिरी दम तक वह कहते थे मैं जिंदगी को भरपूर जीना चाहता हूं। उन्होंने हंस के माध्यम से नए लोगों का मंच दिया।
प्रोफेसर राजेंद्र कुमार
वरिष्ठ आलोचक