महिला अस्पताल के एसएनसीयू में रेडियंट वार्मर बेड के पास लगी बबल सीपीएपी मशीन। संवाद
सुल्तानपुर। मेडिकल कॉलेज के महिला अस्पताल की नवजात शिशु गहन चिकित्सा इकाई (एसएनसीयू) में गंभीर नवजातों के इलाज पर सवाल उठे हैं। अस्पताल में साढ़े तीन साल से वेंटिलेटर और बाल रोग सर्जन की कमी बनी हुई है। सर्जरी की आवश्यकता वाले नवजातों को लखनऊ रेफर करना पड़ रहा है।
25 जुलाई को एक बच्चे की मौत के बाद अस्पताल के संसाधनों पर बहस छिड़ गई है। महिला अस्पताल के तीसरे तल पर 14 बेड की एसएनसीयू है। एसएनसीयू प्रभारी श्यामकरन ने बताया कि हर महीने 50 से अधिक नवजातों को भर्ती किया जाता है। इनमें समय से पहले जन्मे, कम वजन और सांस लेने में परेशानी वाले बच्चे शामिल हैं। जन्मजात विकृतियों वाले बच्चे भी भर्ती होते हैं। मरीज बढ़ने पर एक रेडियंट वार्मर पर दो बच्चों को भी रखना पड़ता है। हर माह चार से पांच गंभीर बच्चों को लखनऊ रेफर करना पड़ता है। विशेषकर ऑपरेशन या अन्य विकृति की स्थिति में यह मजबूरी होती है।
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संसाधनों का अभाव
सीएमएस महिला डॉ. आरके यादव ने बताया कि इकाई में बबल सीपीएपी और फोटोथेरेपी मशीन उपलब्ध है। गंभीर जन्मजात विकृतियों के लिए विशेषज्ञ सर्जरी की सुविधा नहीं है। जन्मजात हृदय दोष और श्वासनली में छेद जैसे मामलों में बाल रोग सर्जन जरूरी हैं। रीढ़ की विकृति वाले बच्चों के लिए भी वेंटिलेटर आवश्यक होता है।
हाईकोर्ट में मामला
खरगीपुर मांधाता, प्रतापगढ़ निवासी प्रीति सिंह के नवजात की भोजन नली बंद थी। बाल रोग सर्जन न होने पर 25 जुलाई को बच्चे को लखनऊ रेफर किया गया। परिजनों के अनुसार, वहां भी अपेक्षित उपचार नहीं मिला और बच्चे की मौत हो गई। आशुतोष कुमार सिंह की जनहित याचिका पर हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया है। मेडिल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. प्रियांक वर्मा ने बताया कि वेंटिलेटर और सर्जन की मांग शासन को भेजी गई है।