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पहले चुनाव में ही खूब हुई थी जोड़-तोड़, ऐन वक्त पर बदलना पड़ा था सिंबल

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विधानसभा के चुनावी दौर में इन दिनों दल-बदल की होड़ मची हुई है। एक दल से टिकट न मिलने पर नेता दूसरे दल में जा रहे हैं और वहां भी बात न बनने पर तीसरे दल का दामन थामने में उन्हें गुरेज नहीं है। ठीक ऐसा ही हाल दलों का भी है। हर दावेदार को शीर्ष नेतृत्व से टिकट का भरोसा दिया जा रहा है मगर उनका वादा कितना सच्चा है, यह खुद नेता और दावेदार भी नहीं जानते। ऐसे माहौल में बुजुर्गों के जेहन में पुराने दिनों की याद ताजा हो रही है। जब नेताओं के सिद्धांत और जुबान ही सब कुछ थे। जिसे वादा कर दिया तो फिर हर हाल में टिकट उन्हें ही मिलता था। प्रत्याशी भी नेताओं के प्रति उतनी ही वफादारी और दमदारी के साथ चुनाव में उतरते थे।
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बात 1952 के पहले चुनाव की है। चोपन के पूर्व ब्लॉक प्रमुख राजनारायण सिंह उसका जिक्र करते हुए बताते हैं कि तब दुद्धी-राबर्ट्सगंज एक ही सीट होती थी। इस पर दो विधायक चुने जाते थे। एक सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व करता था तो दूसरा अनुसूचित जाति का। इस सीट पर सामान्य वर्ग के लिए बृजभूषण मिश्र उर्फ वनवासी जी का नाम तय था। आदिवासी बहुल जिला होने के कारण दूसरे टिकट पर कई दावेदार थे। पिता स्व. धर्मजीत सिंह सहित कांग्रेस के कई अन्य दिग्गज नेता दिल्ली पहुंच गए। उनकी इच्छा थी कि इस सीट से सलखन के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शंकर गोंड को प्रत्याशी बनाया जाए। मामला पंडित नेहरू तक पहुंचा तो उन्होंने मिर्जापुर में ससुराल होने के कारण इसका जिम्मा लाल बहादुर शास्त्री जी को सौंप दिया। पंडित जी की अनुमति पाकर शास्त्री जी ने इसके लिए सहमति देते हुए क्षेत्र में जाकर प्रचार में जुटने का संदेश दिया। शंकर गोंड लौटकर प्रचार में जुट गए। इसकी भनक जब मिर्जापुर जिला इकाई के कांग्रेसियों को लगी तो उन्होंने अपने मनमाफिक उम्मीदवार के लिए पैरवी शुरू कर दी। यह प्रचारित किया गया कि शंकर गोंड की जगह शास्त्री जी के करीबी रामस्वरूप उम्मीदवार होंगे। उनका नामांकन भी करा दिया गया। शंकर गोंड इससे मायूस हो गए। उन्होंने नामांकन तक नहीं किया। जब सिंबल जमा करने की बारी आई तो पार्टी की ओर से भेजे गए प्रपत्र पर शंकर गोंड का ही नाम था मगर तब तक देर हो चुकी थी। नामांकन का समय खत्म होने के कारण पार्टी की ओर से आनन-फानन में दूसरा सिंबल रामस्वरूप के नाम का भेजना पड़ा।
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