सोनभद्र। ओबरा के बिल्ली मारकुंडी स्थित जिस खदान में हादसा हुआ, उसका विवादों से पुराना नाता रहा है। कभी खनन क्षेत्र की सीमा तो कभी सुरक्षा मानकों की अनदेखी पर सवाल उठे, मगर सब दरकिनार कर दिए गए।
इस बार भी वीवीआईपी मूवमेंट को देखते हुए क्रशर एसोसिएशन और प्रशासन ने खनन कार्य बंद रखने के निर्देश दिए थे। इसके बाद भी कृष्णा माइनिंग की खदान में काम जारी था। सात महीने बची पट्टा अवधि का भरपूर उपयोग कर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की चाह में नियम-निर्देशों की अनदेखी बड़े हादसे का कारण बन गई।
डाला और ओबरा क्षेत्र में स्थित खदानों में गिट्टी खनन के लिए प्रशासन की ओर से लीज आवंटित की जाती है। अमूमन पट्टे की अवधि दस वर्ष होती है। इस अवधि में निर्धारित मानकों के तहत खनन करते हुए पहाड़ियों से बोल्डर निकालने की अनुमति है। इसकी अनदेखी कर मनमाने तरीके से खनन के आरोप अक्सर लगते रहे हैं।