स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाएं भी पीछे नहीं रही हैं। सामाजिक और पारिवारिक वर्जनाओं को तोड़कर आंदोलन में कूदीं महिलाओं ने पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आजादी की लड़ाई लड़ी। ऐसी महिलाओं में ही एक थीं राजेश्वरी सरोज दास।
दुद्धी तहसील के सिंगरौली परगना की राजेश्वरी देवी ने दक्षिणांचल में आंदोलन का नेतृत्व किया। महिलाओं को एकजुट कर ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध आवाज बुलंद की। वह जिले की पहली महिला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बनीं और बाद में गढ़वा से दो बार विधायक भी चुनी गईं।
इतिहासकार दीपक कुमार केसरवानी बताते हैं कि 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की गूंज सोनभद्र के दूरस्थ वनवासी बहुल इलाकों में पहुंची। यहां के लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा लेने के लिए हथियार उठा लिया था।
सिंगरौली नगर की महिला राजेश्वरी सरोज दास (देवी जी) ने आदिवासी महिलाओं को संगठित कर आवाज उठाई। दुद्धी के ग्रामीण जंगली इलाकों में आंदोलन का प्रचार- प्रसार करते हुए महिलाओं को एकजुट किया। उनके प्रभाव से मिर्जापुर का तत्कालीन कलेक्टर घबरा उठा और उन्हें गिरफ्तार कर मिर्जापुर जिला कारागार भेज दिया गया।
न्यायालय से उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ षड्यंत्र रचने के जुर्म में 2 वर्ष कैद और 50 रुपये जुर्माना की सजा हुई। उस समय किसी महिला की गिरफ्तारी और जेल की सजा काटना अपने आप में कठोर सामाजिक सजा थी। जेल से रिहा होने के बाद राजेश्वरी सरोज दास (देवी जी) फिर से आंदोलन में जुट गईं। आजादी के बाद 1952 में स्वतंत्र भारत के पहले विधानसभा चुनाव में वह बिहार के पलामू जनपद के विधानसभा नगर ऊंटारी से प्रथम बार विधायक चुनी गईं। इसके बाद 1957 में हुए चुनाव में वह गढ़वा विधानसभा से भी उन्हें जीत मिली।