गरीबी और तंगी से जूझते परिवारों में बच्चों को छोटी उम्र में ही मजदूरी में झोंकने का चलन कम नहीं हो रहा। कॉपी-कलम छुड़ाकर अभिभावक बच्चों के हाथों में फावड़ा, कुदाल और टोकरी थमा रहे हैं।
होटल, ढाबों और रेस्टूरेंट में उनसे काम कराया जा रहा है। पिछले तीन सालों में जिले से 90 से अधिक बच्चों को बाल श्रम से मुक्त कराया गया है। छह बच्चे ऐसे भी रहे, जिन्हें मजदूरी के लिए यहां से अन्यत्र ले जाया जा रहा था।
बच्चों से श्रम कराने की बड़ी वजह जागरूकता का अभाव भी है। ऐसे बच्चों को सरकार 4000 रुपये प्रति माह दे रही, मगर अधिकांश को इसकी जानकारी ही नहीं है।
आदिवासी बहुल जिले में अधिकांश आबादी के लिए खेती-मजदूरी ही जीविकोपार्जन का जरिया है।
यहां के युवा दूसरे जिलों व राज्यों में मजदूरी के लिए जाते हैं। वहां आमदनी होती है तो परिवार का भरण-पोषण भी आसान होता है।
जिंदगी की गाड़ी को आसानी से खींचने के लिए माता-पिता अपने बच्चों को भी इस कार्य में लगाने से नहीं हिचकते। महज 13 साल की उम्र के बाद उन्हें किसी न किसी काम में जोड़ दिया जाता है। इसके बदले बालकाें को अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ती है।
जिले के म्योरपुर, बभनी, दुद्धी, चोपन, कोन, नगवां सहित अन्य आदिवासी बहुल इलाकों में बाल श्रमिकों को काम करते देखा जा सकता है। ऐसे बच्चों की पढ़ाई व पुनर्वास के लिए बाल कल्याण विभाग कई योजनाएं भी चला रहे हैं, लेकिन जानकारी के अभाव में वह इससे जुड़ नहीं पा रहे या जरूरी प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाते।
आंकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 2023-24 में 52 और 2024-25 में 42 बच्चों को बाल श्रम से मुक्त कराया गया। इस वर्ष मई में रेणुकूट स्टेशन से छह बच्चों को मुक्त कराया गया था, उन्हें श्रम के लिए ही अन्यत्र ले जाया जा रहा था। इससे पहले भी बड़ी संख्या में बच्चे बाल श्रम करते पकड़े गए हैं।