परिषदीय विद्यालयों को पेपर लेस बनाने के लिए स्कूलाें में टैबलेट बांटे गए हैं। इसे चलाने के लिए सिम कार्ड भी दिया जा रहा है। जुलाई से ही शिक्षकों को सभी लेखा-जोखा टैबलेट पर ही रखने होंगे। यहां तक कि बच्चों और शिक्षकों की हाजिरी भी ऑनलाइन लगेगी।
इस नई व्यवस्था के साथ विभाग भले ही कड़ी निगरानी के दावे कर रहा हो, मगर जिले के नो नेटवर्क एरिया वाले स्कूलों के लिए यह बड़ी परेशानी बनने जा रही है। शिक्षकाें को टैबलेट पर डाटा फीड करने के लिए नेटवर्क ढूंढना होगा। कोई आसपास के पहाड़ पर चढ़ेगा तो कोई अन्य ऊंची जगह ढूंढेगा।
दूरसंचार विभाग के रिकॉर्ड में करीब 64 गांव ऐसे हैं, जहां किसी भी कंपनी का मोबाइल नेटवर्क नहीं है। इनके अलावा करीब 50 से अधिक गांव ऐसे हैं, जहां सिग्नल काफी कमजोर है। उपभोक्ता बस फोन पर बातचीत ही कर पाते हैं। इंटरनेट उनके लिए सपना बना हुआ है।
इन गांवों में स्थित दो सौ से अधिक स्कूलों में टैबलेट का संचालन शिक्षकों के लिए चुनौती बनी है। नेटवर्क के चलते ही इन इलाकों में ई-पाॅश मशीन से राशन वितरण, सरकारी योजनाओं की जियो टैगिंग के कार्य प्रभावित हैं।
चुनाव में भी प्रशासन को बैग पैक सिस्टम की मदद लेनी पड़ती है। अब रोजाना ऑनलाइन माध्यम से हाजिरी सहित अन्य कार्य परेशानी का सबसे बनेंगे। शिक्षकाें की मुश्किल यह भी है कि अगर समय से उपस्थिति दर्ज नहीं हुई तो ऑनलाइन सिस्टम से वह गैर हाजिर न हो जाएं।
पहाड़ पर चढ़कर करते हैं बात
नेटवर्क विहीन इलाकों में जुगैल, मांची, रामपुर बरकोनिया थाना क्षेत्र के गांव सबसे ज्यादा हैं। इसके अलावा ओबरा के रेणुकापार, अनपरा के भाठ क्षेत्र, कोन, दुद्धी, हाथीनाला के गांवों भी नेटवर्क नहीं है या सिग्नल कमजोर हैं। आम दिनों में सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए लोगों को पहाड़ या किसी ऊंचे स्थान पर चढ़कर सिग्नल ढूंढना पड़ता है। ऑनलाइन सिस्टम में भी ऐसी परेशानी आएगी। टैबलेट में डाटा भरने और तस्वीर खींचने के बाद पोर्टल पर अपडेट कराने के लिए शिक्षकों को ऐसे ही स्थान पर जाना होगा।