पार्टी ने घोरावल सीट से मौजूदा विधायक डॉ. अनिल कुमार मौर्य को उम्मीदवार घोषित किया है। कुशवाहा बहुल इस सीट पर अनिल मौर्य वर्ष 2017 में एक लाख से अधिक मतों से सपा को हराकर निर्वाचित हुए थे। इससे पहले वह वर्ष 2007 में मिर्जापुर की राजगढ़ सीट से भी बसपा के सिंबल पर विधायक चुने गए थे, जबकि 2012 में नवसृजित घोरावल सीट से उन्हें शिकस्त मिली थी।
इस बार वह चौथी बार जनता के बीच होंगे। उधर, अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित ओबरा विधानसभा सीट से भाजपा ने राज्य मंत्री संजीव कुमार गोंड को उम्मीदवार घोषित किया है। वर्ष 2017 में पहली बार निर्वाचित संजीव गोंड को सरकार ने कैबिनेट के अंतिम विस्तार में अनुसूचित जनजाति कोटे से राज्य मंत्री बनाया था।
इस बार उन्हें गोंड बहुल दुद्धी सीट से उतारे जाने की चर्चा थी, लेकिन संजीव गोंड के इंकार के बाद दोबारा ओबरा की ही जिम्मेदारी दी गई है। भाजपा की इस सूची में दो सीटों पर प्रत्याशी घोषित होने के बाद अब राबर्ट्सगंज और दुद्धी विधानसभा सीट को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
राबर्ट्सगंज सीट को लेकर भाजपा के अंदरखाने में खूब खींचतान मची हुई है। ऐसे में माना जा रहा है कि पार्टी यहां से नया दांव खेल सकती है। वहीं दुद्धी की सीट को फिर से सहयोगी दल के खाते में ही डाले जाने की भी चर्चा है।
सपा में उलटफेर के कयास तेज
घोरावल विधानसभा सीट पर सपा गठबंधन की सहयोगी अपना दल-कमेरावादी ने सुरजीत सिंह पटेल को उम्मीदवार बनाया है। इसकी घोषणा के बावजूद इस सीट पर अपनी दावेदारी छोड़ने को सपा नेता तैयार नहीं हैं। सपा में टिकट के लिए दावेदारी कर रहे नेता इस सीट पर अंतिम समय में बड़े उलटफेर के दावे कर रहे हैं।
यहां तक भी कहा जा रहा है कि नेतृत्व ने अपना आशीर्वाद एक दावेदार को दे भी दिया है। अब बस एलान बाकी है। पार्टी के जिम्मेदार पदाधिकारी भी उलटफेर की संभावना से इंकार तो नहीं कर रहे, लेकिन किसी भी तरह का बयान देने से बच रहे हैं। उनका कहना है कि नेतृत्व स्तर से ही इस बारे में स्पष्ट किया जाएगा।
नामांकन के साथ चुनावी घमासान अब चरम पर पहुंचने लगा है, मगर बसपा ने अब तक पत्ते नहीं खोले हैं। पार्टी की ओर से पूर्व में दो सीटों पर प्रभारी घोषित किए गए थे। वह अपना टिकट पक्का मानकर लगातार चुनाव प्रचार में भी जुटे हैं। एक ने तो पर्चा भी खरीद लिया है, लेकिन अंतिम समय में उलटफेर के लिए चर्चित इस पार्टी की ओर से अब तक उम्मीदवार के नाम घोषित नहीं हुए हैं। ऐसे में प्रभारियों की धड़कन भी अब बढ़ने लगी है।