सोनभद्र। आदिवासियों को वन भूमि पर अधिकार देने के लिए लागू किया गया वनाधिकार कानून फाइलों में दम तोड़ रहा है। वन भूमि पर अधिकार के लिए दाखिल हुए 62 हजार दावों में से महज सात हजार का ही निस्तारण हो सका है। शेष दावे फाइलों में करीब एक वर्ष से कैद हैं। कहीं इन दावों को दीमक चट न कर जाएं। इसका भय अब आदिवासियों को सता रहा है।
भारत सरकार ने वन भूमि पर काबिज लोगाें को मालिकाना हक देने के लिए वनाधिकार कानून लागू किया था। इसके तहत आदिवासियों से दावे और आपत्तियां मांगी गई थीं। इसमें भी कुछ नियम और शर्तें लागू की गई थीं। शर्त यह थी कि अनुसूचित जनजाति में शामिल जातियों को वन भूमि पर काबिज होने का प्रमाण 13 सितंबर 2005 के पहले तक का देना होगा, जबकि अनुसूचित जाति वर्ग से जुड़ी जातियों के लोगों को तीन पीढ़ी से वन भूमि पर काबिज होने का प्रमाण देना होगा।
वर्ष 2005 में लागू हुए इस कानून की हकीकत जिले में देखी जा सकती है। वन भूमि पर पट्टे के लिए करीब 62 हजार लोगाें ने दावे किए थे लेकिन इनमें से महज सात हजार लोगों को ही पट्टा दिया गया। शेष दावे निस्तारित होने की बाट जोह रहे हैं। अमूमन जो लोग दशकों से दस बीघे वन भूमि पर काबिज हैं, उन्होंने पूरी भूमि पर अधिकार का दावा प्रस्तुत किया। लेकिन उन्हें कम ही जमीन का अधिकार दिया गया। अब शेष पड़े करीब 55 हजार दावों का निस्तारण कब होगा, यह भविष्य के गर्भ में हैं। दावों से जुड़ी फाइलें कार्यालय की शोभा बढ़ा रही हैं। कहीं ऐसा न हो कि इन फाइलों को दीमक ही चट कर जाएं। इन शेष पड़े दावों को न तो खारिज ही किया जा रहा है और न ही स्वीकार। ऐसे में आदिवासियों की उम्मीद धरी की धरी रह गई है।