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सर्वे, गणना के काम सौंपने से शिक्षा बेपटरी

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अनपरा । प्राथमिक व पूर्व माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षकों को सर्वे व गणना जैसे काम में लगाए जाने से शिक्षा व्यवस्था बेपटरी होती जा रही है। ग्राम पंचायतों में शौचालय व पेंशन आदि के पात्रों की खोज कर 10 अगस्त को रिपोर्ट करने वाले शिक्षकों को अब बाल गणना के लिए गांव की खाक छाननी पड़ेगी। इसकी रिपोर्ट दो दिनों में देनी है। कुछ शिक्षकों ने इसका विरोध भी किया है। कहना है कि माह में 15 दिन सर्वे व गणना आदि में ही निकल जा रहा है। ऐसे में शिक्षा व्यवस्था प्रभावित हो रही है।
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जिले में परिषदीय स्कूलों की कुल संख्या 2458 है। इन स्कूलों में कुल 6232 शिक्षक तैनात है। जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने शुक्रवार को फरमान जारी कर बाल गणना का निर्देश दिया है। शिक्षकों को 20 अगस्त तक हर हाल में बाल गणना कर उसकी रिपोर्ट बीएसए कार्यालय को देनी है। हैरत की बात यह है कि शिक्षकों ने इसके पहले ग्राम पंचायतों में प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री आवास, विधवा, विकलांग व वृद्धा पेंशन के लिए घर-घर जाकर पात्रों का सर्वे किया था, जिसकी रिपोर्ट शिक्षकों द्वारा 10 अगस्त को ब्लाक स्तरीय अधिकारियों के जरिए जिला प्रशासन को मुहैया कराई गई थी। इस सर्वे को खत्म हुए एक सप्ताह भी नहीं बीता, बाल गणना के लिए सर्वे का फरमान जारी कर दिया गया। ऐसे में प्राथमिक शिक्षा की दशा क्या होगी, आसानी से समझा जा सकता है। सबसे अधिक दुर्दशा उन विद्यालयों की है जहां महज एक ही शिक्षक तैनात है और उसकी ड्यूटी बाल गणना में लगा दी गई है। जनपद में एक शिक्षक विद्यालयों की तादाद 997 है। शिक्षकों का कहना है कि बच्चों को शिक्षा देने का अवसर ही कम मिल रहा है। बैठक, सर्वे आदि में ही 15 दिन निकल जा रहे है। शिक्षकों ने नाम न छापने की शर्त पर सरकार को सलाह दी है कि न्यायालय से शिक्षामित्रों का समयोजन निरस्त कर दिया गया है। ऐसे में मिड-डे-मील, यूनिफार्म वितरण, विद्युतीकरण, हर तरह के सर्वे आदि की जिम्मेदारी शिक्षामित्रों को देकर शिक्षकों को इससे मुक्त कर देना चाहिए, ताकि वे बच्चों की शिक्षा पर पूरी तरह केंद्रीत होकर उन्हें शिक्षित करें। जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी डा. गोरखनाथ पटेल ने कहा कि शासन के निर्देश पर ही सर्वे का काम शिक्षकों को सौंपा जाता है। मामला शासन स्तर का है। ऐसी दशा में वे किसी भी तरह की टिप्पणी नहीं कर सकते हैं।
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