सीतापुर। मोदी लहर में भी साइकिल को दौड़ाने में कामयाब रहे विधायक नरेंद्र वर्मा की इस सीट पर इस बार के समीकरण कुछ बदले हुए संकेत दे रहे हैं। पिछले दो विधानसभा के चुनावों में सपा के कम होते वोट प्रतिशत और भाजपा के बढ़ते जनाधार से राजनीतिक गलियारों में नई बहस छिड़ गई है। ऐसे में महमूदाबाद सीट की इस बार सियासी तस्वीर बदल सकती है।
महमूदाबाद विधानसभा सीट पर पिछले कई चुनावों के दौरान राजनीतिक समीकरणों को दरकिनार करते हुए विधायक नरेंद्र वर्मा ने साइकिल की रफ्तार बरकरार रखी थी। राजनीति के पंडितों के हिसाब से चुनाव में मतदान प्रतिशत का बढ़ना चुनाव परिणाम में बदलाव के आसार को दर्शाता है। 2017 के विधानसभा चुनाव में इन पंडितों के ज्ञान को सपा के प्रत्याशी ने दरकिनार कर बढ़ते मतदान प्रतिशत में साइकिल दौड़ाने का काम किया था। 2022 के विधानसभा चुनाव में यह मतदान प्रतिशत तेजी से गिरा है। चर्चा है कि इस बार गिरते मतदान प्रतिशत में साइकिल का बैलेन्स बिगड़ने लगा है।
महमूूदाबाद विधानसभा सीट पर वर्ष 2002 में नरेंद्र वर्मा ने भाजपा में रहते हुए कमल खिलाने का काम किया था। इसके बाद वह 2007 के विधानसभा में सपा के टिकट पर इस सीट से चुनाव लड़े। चुनाव में नरेंद्र वर्मा ने इस सीट पर साइकिल दौड़ा दी। वर्ष 2012 के चुनाव में इस सीट पर 2 लाख 63 हजार 909 मतदाता थे।
चुनाव में इस सीट पर लगभग 70.39 फीसदी मतदान हुआ था। इस मतदान के प्रतिशत के साथ महमूदाबाद में साइकिल की रफ्तार बनी रही। 2017 के विधानसभा चुनाव में 2 लाख 90 हजार 920 मतदाता थे। चुनाव में 72.41 फीसदी मतदान हुआ, लेकिन फिर भी साइकिल की रफ्तार पर ब्रेेक नहीं लगा।
राजनीति के जानकारों की माने तो चुनाव में बढ़ता मतदान प्रतिशत बदलाव की निशानी होता है। लेकिन नरेंद्र वर्मा ने इस आंकड़े को दरकिनार कर साइकिल की रफ्तार को ब्रेक नहीं लगने दिया। 2022 के विधानसभा चुनाव में नरेंद्र वर्मा ने फिर से इस सीट पर साइकिल की सवारी की है। लेकिन इस बार मतदान प्रतिशत करीब 69.42 फीसदी रहा, जो कि 2017 की तुलना में करीब 2.99 फीसदी कम है।
बढ़ते मतदान प्रतिशत में भले ही नरेंद्र वर्मा ने साइकिल का हैंडल मजबूती से पकड़ कर बैलेंस बनाए रखने में कामयाब रहे हों, लेकिन गिरते मतदान प्रतिशत से क्षेत्र में चर्चाओं का बाजार गरमाने लगा है। मतदाताओं में चर्चा है कि इस बार कम हुए मतदान प्रतिशत में कमल खिलने के आसार बनते दिखाई दे रहे है। इन चर्चाओं में कितनी दम है यह तो आने वाली 10 मार्च को ही साफ हो सकेगा।
2012 का चुनाव परिणाम
2012 के विधानसभा चुनाव में इस सीट पर सपा के नरेंद्र वर्मा 86 हजार 5 सौ 80 मत पाकर इस सीट पर जीत दर्ज की थी। वहीं 66 हजार 9 सौ 91 मत पाकर बसपा के अहमद अंसारी दूसरे नंबर पर रहे थे। तीसरे नंबर पर रहे कांग्रेस के प्रत्याशी मोहन प्रसाद को 20 हजार 4 सौ 58 मत मिले थे। इस चुनाव में भाजपा बहुत पीछे रह गई थी।
2017 के चुनाव परिणाम
2017 के विधानसभा चुनाव में भी सपा ने इस सीट पर कब्जा जमाया था। इस बार सपा के नरेंद्र वर्मा को 81 हजार 4 सौ 69 मत पाकर विजयी रहे थे। वहीं भाजपा की आशा मौर्या 79 हजार 5 सौ 63 मत पाकर दूसरे नंबर रहीं थी। बसपा के प्रद्युम्न वर्मा 45 हजार 50 मत पाकर तीसरे नंबर रहे थे।
सपा के पांच हजार से अधिक वोट हुए कम
2012 के चुनाव में जीत दर्ज करने वाले नरेंद्र वर्मा ने 2017 के बढ़ते मतदान प्रतिशत में भी जीत तो जरूर दर्ज कर ली थी। लेकिन 2012 के मुकाबले में उन्हें इस चुनाव में कम वोट मिले थे। आंकड़े बताते हैं कि, नरेंद्र वर्मा को 2012 में जहां 86580 मत मिले थे, जोकि 2017 के चुनाव में घटकर 81469 रह गए थे। इस हिसाब से देखा जाए तो नरेंद्र वर्मा को पछिले 2012 के चुनाव के मुकाबले 2017 के चुनाव में 5111 मत कम मिले थे।
सपा के वोटों का गिरा ग्राफ
2017 के चुनाव परिणामों पर एक नजर डाले तो आंकड़े यह बताते हैं कि भाजपा प्रत्याशी को इस चुनाव में सपा ने बहुत की कम मतों से परास्त किया था, लेकिन इस जीत में भी सपा को लगभग पांच हजार मतों का नुकसान हुआ था। वहीं भाजपा का ग्राफ एक दम से बढ़ा था। राजनीति के जानकारों की माने तो इस बार भी सपा का वोटों का ग्राफ और गिर चुुका है। अगर यह बात सही साबित हुई तो भाजपा के बढ़ते वोट ग्राफ के चलते इस सीट पर कुछ नया हो सकता है।