सीतापुर। लॉकडाउन के बाद सफर भले ही अनलॉक कर दिया गया हो, लेकिन मुसाफिरों के लॉक होने से रोडवेज लगातार घाटे में जा रहा है। निगम को टैक्स भरने तक की आमदनी बसों से नहीं हो रही है। परिवहन निगम की ओर से बसों को सरेंडर कर दिया गया है।
एक जून से अनलॉक-1 के साथ ही रोडवेज बसें सड़कों पर फर्राटा भरने लगी हैं, लेकिन कोरोना के डर से पहले की अपेक्षा परिवहन निगम को आधी भी सवारियां नसीब नहीं हो रही हैं। यही वजह है कि बसों के पहिए घूम तो रहे हैं, लेकिन आमदनी की रफ्तार पर ब्रेक लग गया है।
लॉकडाउन पूर्व सवारियों से खचाखच भरी रहने वाली बसें आज एक-एक यात्रियों के लिए तरस रही हैं। कोरोना काल के पहले मुसाफिर बसों में एक-एक सीट के लिए परेशान रहते थे, लेकिन आज हालात बिल्कुल उलट हैं। अब बसों को यात्री नहीं मिल रहे हैं। बसों का संचालन शुरू हुए आज एक माह आठ दिन गुजर चुके हैं, लेकिन हालात बदलते नहीं दिख रहे हैं।
दिन पर दिन डिपो घाटे में जा रहा है। हालांकि, जून की शुरुआती दिनों की अपेक्षा मुसाफिरों की संख्या में इजाफा हुआ है, लेकिन वो रौनक नहीं है, जो कभी हुआ करती थी। मसलन, आमदनी से अधिक खर्चा है। यही वजह है कि एआरएम विमल राजन को लगातार घाटे में जा रहे विभाग की माली हालत को देखते हुए आखिरकार बसों को सरेंडर करने का फैसला लेना पड़ा। प्रतिदिन का सवारी और रोड टैक्स बचाने के लिए एआरएम ने डिपो की 26 बसों को ही सरेंडर कर दिया है। इससे निगम को महीने में लाखों के टैक्स की भरपाई परिवहन विभाग को नहीं करनी पड़ेगी।
छह साल की उम्र पूरी कर चुकी हैं सरेंडर बसें
परिवहन निगम ने रोडवेज की जिन 23 बसों को सरेंडर किया है, उनकी उम्र (सड़क पर चलते हुए) छह साल से अधिक हो चुकी है। इन सभी बसों का प्रति सीट 150 रुपये का टैक्स रोडवेज को देना पड़ता था। सभी 23 बसें 52 सीटर हैं। ऐसे में एक बस का टैक्स महीने में 7800 रुपये पड़ता है। 23 बसों का टैक्स एक लाख 79 हजार 400 रुपये पड़ता था, लेकिन बसों के सरेंडर होने से निगम को इतना फायदा होगा। इसके अलावा रोड टैक्स भी बचेगा।
डिपो की 26 बसों को सरेंडर कर दिया गया है। आमदनी से अधिक खर्चा हो रहा था। लागत तक नहीं निकल रही थी। टैक्स भरने तक के पैसे बसों से नहीं आ पा रहे थे। इसलिए सरेंडर की कार्रवाई की गई है। हालात सामान्य होने पर बसें फिर से सड़कों पर दौड़ने लगेंगी।
- विमल राजन, एआरएम