सीतापुर। शहर के बाशिंदों को मकान की दाखिल खारिज कराने में एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है। कारण, करीब एक हजार लोगों की दाखिल खारिज लटकी हुई है। इसे लटके हुए करीब दो से तीन साल गुजर गए हैं। लोग कई बार नगर पालिका आकर शिकायत दर्ज करा चुके हैं। फिर भी उनकी समस्या जस की तस बनी हुई है। इसके अभाव में मकान मालिकों के कई जरूरी काम लटके हुए हैं। नगर पालिका को राजस्व का नुकसान भी हो रहा है।
सीतापुर नगर पालिका क्षेत्र का दायरा करीब आठ किलोमीटर में फैला है। नगर पालिका क्षेत्र में लोग अपना मकान बनवाने के बाद दाखिल खारिज करवाते है। दाखिल खारिज की प्रक्रिया पूर्ण करने के बाद लोगों ने नगर पालिका में अपना आवेदन जमा कर दिया था। इससे उनको उम्मीद थी कि जल्द ही मकान की दाखिल खारिज हो जाएगी।
लेकिन नगर पालिका की सुस्त कार्यशैली के चलते यह फाइलें लटकी हुई हैं। नगर पालिका के सूत्रों के मुताबिक करीब एक हजार फाइलें पड़ी हुई है। इनको जमा हुए दो से तीन बरस बीत गए है। अभी तक इनका निस्तारण नहीं हो सका है। जबकि इनके निस्तारण को लेकर आवेदनकर्ता तमाम बार नगर पालिका की भागदौड़ कर चुके हैं। हर बार उनको कोई न कोई बहाना बताकर वापस कर दिया जाता है।
लोगों के जरूरी काम लटके हुए है। जब मकानों की दाखिल खारिज नहीं हो पा रही है तो नगर पालिका को राजस्व का नुकसान भी उठाना पड़ रहा है। दाखिल खारिज होने के बाद ही मकान का हाउस टैक्स तय होता है। जब दाखिल खारिज नहीं है तो हाउस टैक्स भी फिक्स नहीं हो पा रहा है। इससे नगर पालिका व बाशिंदों दोनों को नुकसान उठाना पड़ रहा है।
इसलिए कराते हैं दाखिल खारिज
दाखिल खारिज का मतलब होता है मकान व प्लाट को राजस्व अभिलेखों में दर्ज कराना। अगर पहले से कोई उस जमीन पर काबिज था और उससे आपने प्लाट खरीद लिया है। लेकिन दाखिल खारिज नहीं करवाई है तो राजस्व अभिलेखों में विक्रेता का नाम दर्ज होगा। अगर आपने दाखिल खारिज करवा ली है तो आपके नाम प्लाट दर्ज हो जाएगा।
इसका सबसे बड़ा फायदा यह होता है कोई भी विक्रेता एक ही प्लाट दो बार नहीं बेच सकता है। राजस्व अभिलेखों में वह प्लाट आपके नाम दर्ज होगा। अगर केवल बैनामा करवाया है, दाखिल खारिज नहीं करवाई है तो विक्रेता उस प्लाट को कई बार बेच सकता है। इसलिए दाखिल खारिज करवाना बहुत जरूरी होता है।
पुराने ईओ ने बढ़ाई मुश्किलें
अगर दाखिल खारिज की बात की जाए तो तत्कालीन ईओ गुरू प्रसाद पांडेय ने लापरवाही बरती। इस वजह से लंबित मामले बढ़ते चले गए। गुरू प्रसाद पांडेय ने दो बरस से अधिक के कार्यकाल में दाखिल खारिज ही नहीं की। बहुत असरदार लोगों की ही फाइलें पास की। इससे आम जनता बहुत परेशान रहीं।
बाबू भी दबाएं बैठे हैं फाइलें
नवागत ईओ वैभव त्रिपाठी के जॉइनिंग करते ही सबसे पहले दाखिल खारिज का ही मुद्दा उठा था। इस पर उन्होंने पेङ्क्षडग मामले बढने पर नाराजगी जताई थी। ईओ ने बैठक बुलाकर सख्त लहजे में कहा था जितने भी फाइलें जिस काउंटर पर लंबित है उनका निस्तारण करना शुरू कर दिया गया। सभी फाइलें मेरे समझ लाई जाए। अगर किसी फाइल में कोई कमी है तो उस कमी को पूरा कराया जाए। बेवजह फाइलें न लटकाई जाए।
बाबूओं को दी नसीहत
अगर सूत्रों की माने तो नगर पालिका के बाबू दाखिल खारिज की हर फाइल पर कुछ न कुछ मिलने की ही राह देखते रहते है। अगर किसी ने बाबूजी को चढ़ावा नहीं दिया तो वह उसकी फाइलें लटकाए रहते हैं। कोई न कोई कमी बताकर उसको लटकाए रहते है। यह शिकायत ईओ तक पहुंची तो उन्होंने सख्त लहजे में बाबूओं को हिदायत दी। कहा, फाइलें जैसी भी है, उनका लिखित में निस्तारण हो। अगर किसी ने फाइल लटकाई तो ठीक नहीं है। बैंक डोर के रास्ते बंद कर दीजिए।