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बैग के बोझ तले दब रहा बच्चों का बचपन

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सिविल लाइंस स्थिति एक प्राइवेट स्कूल से निकलते बच्चे। - संवाद - फोटो : SITAPUR
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सीतापुर। बच्चे की उम्र महज चार साल... लेकिन नन्हें कंधों पर लदे स्कूल बैग का वजन चार किग्रा। वह नर्सरी का छात्र है। तीसरी में पढ़ने वाले छात्र के कंधे पर सात किग्रा का बैग था, जबकि कक्षा सात में पढ़ने वाले छात्र के बैग का वजन नौ किग्रा है। बुधवार को ये सभी बच्चे छुट्टी होने पर स्कूल से निकल रहे थे। किसी की कमर झुकी जा रही थी तो कोई बैग के भार से दबा जा रहा था। एक-एक कदम आगे बढ़ाने के लिए उन्हें खुद को आगे खींचना पड़ रहा था। उन्हें तकलीफ हो रही थी, लेकिन इससे जिम्मेदारों को कोई फर्क नहीं पढ़ रहा है।
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बैग के भार को लेकर न कोई नियम है न कानून। कान्वेंट स्कूलों के अपने-अपने नियम हैं। अपनी शर्तें हैं। इसके बदले में वह अभिभावकों से मोटी रकम वसूल कर इसका भार उनकी जेब पर तो डाल ही रहे हैं, वहीं बच्चों के कंधों पर बैग का भार इतना है कि सहा नहीं जा रहा है। पर हैरानी इस बात की है कि यह नजर सभी को आ रहा है, फिर भी सब बेखबर हैं। हालात यह है कि ‘कान्हा’ का बैग ‘बलराम’ से भी भारी है।
मसलन छोटी कक्षा में पढ़ने वाले छात्र का बैग ज्यादा वजन है, जबकि बड़ी कक्षा में पढ़ने वाले छात्र के बैग का भार उससे कम है। कॉपी, किताबों से भरे बड़े-बड़े बैग लादकर बच्चे गिरते और लड़खड़ाते चले जा रहे हैं। कमर तिरछी होती जा रही है... स्कूल बैग कंधे से बार-बार नीचे तक आ जा रहे है। बच्चे उसे फिर उसे संभालते हैं, खिसकाते हैं, इस तरह की तस्वीरें हर रोज आपको शहर के सभी कान्वेंट स्कूलों के बाहर नजर आ जाएंगी।
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बुधवार को अमर उजाला टीम को भी ऐसी तस्वीरें नजर आईं। टीम ने बड़े-बड़े बैग लेकर जा रहे छोटे-छोटे बच्चों को रोका। इनमें नर्सरी से कक्षा पांच और सात के बच्चे थे। इन सबकी उम्र 4 से 14 साल के बीच रही होगी, लेकिन इनके कंधों पर लदे बैग का भार आप सुनेंगे तो चौंक जाएंगे। नर्सरी के बच्चे की उम्र चार साल के करीब थी। उसके स्कूल बैग का वजन कराया गया। वह भी करीब चार किग्रा का ही निकला। कक्षा तीन के छात्र के बैग का वजन सात किग्रा पाया गया।
पांचवीं की पढ़ाई कर रहे छात्र के बैग का वजन छह किग्रा था, जबकि कक्षा सात में पढ़ने वाले छात्र के बैग का वजन नौ किग्रा रहा। यह स्याह हकीकत है कान्वेंट स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की उम्र, कक्षा और उनके बैग के भार की। अब इसी से सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि इन बच्चों पर इतनी छोटी सी उम्र में पढ़ाई का बोझ इस तरह से स्कूल डालेंगे तो आने वाले दिनों में इनके स्वास्थ्य पर कितना बुरा प्रभाव पड़ेगा। शारीरिक विकास से लेकर कई तरह की बीमारियां भी बच्चों को घेर सकती हैं, लेकिन इसके बाद भी न तो अभिभावक सचेत हो रहे हैं और न ही जिम्मेदार जाग रहे हैं।
निजीकरण के दौर में दम तोड़ रही कवायद
छोटे से बच्चों के कंधों पर भारी बैग देखकर लोग व्यथित भी हो रहे हैं। सबसे खास बात तो यह है कि सरकारी स्कूलों की अपेक्षा कान्वेंट स्कूलों के बैग का वजन अधिक होता है। शिक्षा के निजीकरण के इस दौर में बस्ते का बोझ हल्का करने की कवायद दम तोड़ रही है। यूकेजी से लेकर हायर सेकेंडरी तक की कक्षाओं के छात्र भारी बैग उठाने को मजबूर हैं।
घर पहुंचते-पहुंचते हांफने लगते हैं बच्चे
हंसने-खेलने की उम्र में छात्रों के कंधों पर बैग के बोझ से वह लाचार से नजर आते हैं। कॉपी-किताबों का वजन उठाना मुश्किल हो रहा है। दोपहर में छुट्टी के बाद घर पहुंचते-पहुंचते बच्चे हांफ जाते हैं। बुधवार को अमर उजाला टीम को मिले अभिभावक राजकरन, अनुज, गौरी गुप्ता आदि ने बताया कि घर पहुंचते ही बच्चे बैग एक तरफ रखकर सोफा और बेड पर गिर जाते हैं, फिर 15 से 20 मिनट बाद कहीं उठते हैं। कुछ अभिभावकों ने बताया कि उनके बच्चे किसी तरह से बैग घर के दरवाजे तक ले जाते हैं। वह घर की दूसरी मंजिल पर रहते हैं। वहां तक बैग ले जा पाने में असमर्थ बच्चे गेट पर ही छोड़ देते हैं।
कंधे में दर्द की शिकायत
अमर उजाला टीम को पड़ताल के दौरान एक अभिभावक मिले। उन्होंने बताया कि उनके बेटे आर्यन जायसवाल के कंधे में काफी दर्द होने लगा था। इसको लेकर डॉक्टर को दिखाया। डॉक्टर ने दवा दी और सलाह दी थी कि कंधे पर बैग नहीं लादकर चलें। इसके बाद बैग कंधे पर लेकर आर्यन नहीं जाता है।
बच्चों का बैग अभिभावक मिले टांगे
बच्चे बैग के बोझ से किस कदर दबे हुए हैं, इसके लिए बुधवार को कैमरे में कैद हुईं तस्वीरें ही काफी हैं। कई बच्चे ऐसे मिले, जो कई किग्रा का बैग खुद उठा नहीं पा रहे थे, ऐसे में छुट्टी के समय उन्हें लेने आए अभिभावकों को बच्चों का बैग टांगकर ले जाना पड़ा।
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