सीतापुर। विधानसभा चुनाव 2022 के गुरुवार को आए चौंकाने वाले नतीजे भाजपा के बढ़ते जनाधार की ओर इशारा कर रहे हैं जबकि कांग्रेस वजूद बचाने की जंग लड़ती नजर आ रही है। इस बार भी कांग्रेस पार्टी का ‘शून्य’ बरकरार रहा। वहीं, इस चुनाव में भाजपा को सीधी टक्कर देने वाली सपा का इस बार भी प्रदर्शन पिछले चुनाव की तरह एक सीट बचाने तक ही सिमट गया है। बसपा का जनाधार भी लगातार कमजोर होता जा रहा है।
कैडर वोट बैंक भी बसपा से बिदक चुका है। अप्रत्याशित परिणाम इस बात को और बल दे रहे हैं। अब भाजपा के बढ़ते कद और विपक्षी दलों के कमजोर होते जनाधार के पीछे अलग-अलग वजहें और समीकरण भी हैं लेकिन इस बार के नतीजे इस बात के भी संकेत दे रहे हैं कि हारने वाली पार्टियों को इन नतीजों से सबक लेने की बड़ी जरूरत है।
जिले में 2022 का विधानसभा चुनाव जीतने के लिए हर पार्टी ने चुनावी बिसात काफी रोचक बिछाई थी। हर सीट पर दलों ने अपने-अपने आकलन के अनुसार, चेहरों को उतारा था लेकिन चुनाव में सीधी टक्कर के आसार भाजपा और सपा के बीच ही था। दोनों ही दलों ने पूरी जोर-आजमाइश के साथ चुनाव लड़ा लेकिन गुरुवार को आए नतीजों ने हर किसी को चौंका दिया है।
उम्मीद से परे आए परिणामों में सदर, महोली, हरगांव, मिश्रिख, बिसवां, सिधौली, महमूदबाद व सेवता में भाजपा के सियासी पहलवानों ने चुनावी दंगल जीत लिया जबकि पूरे चुनाव में बराबरी का मुकाबला कर रही सपा जिले में सिर्फ एक ही सीट बचा पाने में कामयाब रही। लहरपुर सीट सपा के खाते में गई है। यह तो 2022 के चुनाव की तस्वीर है। अब आपको भाजपा के बढ़ते और बाकी पार्टियों के कमजोर होते जनाधार से रूबरू कराने के लिए फ्लैश बैक में ले चलते हैं।
आइए नजर डालते हैं पांच साल पूर्व 2017 के चुनाव की तस्वीर पर। 2017 में भाजपा ने सीतापुर में सदर, महोली, मिश्रिख, बिसवां, लहरपुर, हरगांव व सेवता में कमल खिलाया था जबकि महमूदाबाद में सपा की साइकिल दौड़ी थी और सिधौली में हाथी चिंघाड़ा था। इस तरह से पांच साल के अंतर में भाजपा को एक सीट का जिले में और फायदा मिला जबकि सपा अपना पुराना ही प्रदर्शन दोहरा पाने तक सिमट गई।
मसलन, एक सीट बचाकर ही संतोष करना पड़ा। वहीं, बसपा की बात करें तो मोदी लहर में 2017 के चुनाव में सिधौली की सीट बचाने में कामयाब रही थी लेकिन इस बार उसमें भी फेल हो गई। बसपा का इस बार के चुनाव में पूरी तरह से सूपड़ा साफ हो गया। कांग्रेस शून्य से आगे नहीं बढ़ सकी। 2017, 2012, 2007, 2002 से लेकर पिछले कई चुनावों में कांग्रेस खाता तक नहीं खोल सकी। ऐसे में कांग्रेस वजूद की जंग लड़ती नजर आ रही है। यह तो 2017 की चुनावी पिक्चर है।
अब बात करतें हैं 2012 के चुनाव की। जिले में हुए इस चुनाव में भाजपा अपना खाता तक नहीं खोल सकी थी लेकिन सात सीटें पाने वाली सपा 2017 में एक सीट पर आकर सिमट गई जबकि भाजपा ने सात सीट जीत कर सपा की जगह जिले में बना ली थी। 2017 मेें सात सीटों पर भगवा फहराकर बढ़ने वाली भाजपा की बादशाहत अब और बढ़ गई है। इस बार आठ सीटें जीतकर भाजपा ने पार्टी की साख को जिले में और बड़ कर दिया है।
2022 के चुनाव में जिले में खाता न खोल पाने वाली बसपा ने 2007 के चुनाव में जिले की पांच सीटें जीती थीं लेकिन पांच साल बाद 2012 के हुए चुनाव में तीन सीटें गवां दी थी। 2012 में हरगांव और लहरपुर में दो सीटों पर बसपा का कब्जा रहा था। पांच साल बाद 2017 में हुए चुनाव में सिर्फ एक ही सीट सिधौली ही बसपा जीत सकी। इसके बाद अब 2022 के चुनाव में एक भी सीट बसपा को नहीं मिली।
2007 के चुनाव में सदर, महमूदाबाद, बेहटा (अब सेवता) की सीट को जीतने वाली सपा ने पांच साल बाद 2012 के चुनाव में शानदार प्रदर्शन किया। सदर, महोली, मिश्रिख, बिसवां, सिधौली, सेवता व महमूदाबाद में साइकिल तेजी से दौड़ी लेकिन पांच साल बाद 2017 के चुनाव में सपा सिर्फ एक सीट महमूदाबाद पर आकर सिमट गई। पांच साल बाद ठीक छह सीटों का नुकसान पार्टी को हुआ।
अब 2022 के चुनाव में राजनीतिक पंडितों से लेकर चल रही चुनावी बयार से ऐसे कयास लगाए जा रहे थे कि इस बार का प्रदर्शन 2017 की अपेक्षा बेहतर रहेगा। पुराने नुकसान की भरपाई भी पार्टी करेगी लेकिन ऐसा हो नहीं सका। एक सीट के सहारे 2017 का प्रदर्शन ही दोहरा सकी।
जिले में वजूद बचाने की जंग लड़ रही कांग्रेस के हाथ को जनता का साथ लंबे समय से नहीं मिला। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक 1989 में बिसवां में पदमा सेठ कांग्रेस के टिकट से चुनाव जीती थीं। इसके बाद कांग्रेस का कोई भी प्रत्याशी अकेले चुनाव नहीं जीत सका। 1996 में बसपा-कांग्रेस के गठबंधन में महमूदाबाद से अम्मार रिजवी चुनाव जीत गए थे।