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Siddharthnagar News: मेिडकल काॅलेज में हृदय रोग के डाॅक्टर नहीं, रेफर किए जाते हैं मरीज

Thu, 12 Feb 2026 12:08 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
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राहुल त्रिपाठी
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सिद्धार्थनगर। सीने में तेज दर्द हो या दबाव, सांस फूल रही हो या फिर ठंड में पसीना और चक्कर आ रहे हाें तो बिना समय गंवाए डॉक्टर के पास जरूर जाएं, लेकिन मेडिकल कॉलेज का रुख करना गोल्डन आवर को बर्बाद करने जैसा है। मेडिकल कॉलेज नॉन सुपर स्पेशलिटी होने के कारण यहां कार्डियोलॉजी विभाग नहीं है।
नतीजतन हार्ट अटैक के मरीजों को प्राथमिक उपचार के बाद बाहर रेफर करना पड़ता है। 10 फरवरी को 26 वर्षीय महिला को गंभीर स्थिति में गोरखपुर रेफर किया गया। वहीं, 9 फरवरी को मोहाना क्षेत्र के तीर्थराम को प्राथमिक उपचार के बाद रेफर करना पड़ा। इलाज न मिल पाने से कई बार मरीज की जान जोखिम में पड़ जाती है।
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जिले के मेडिकल कॉलेज की इमरजेंसी में प्रतिदिन हार्ट अटैक के लक्षण वाले तीन से चार मरीज पहुंच रहे हैं, जिनमें से एक-दो मरीजों में हार्ट अटैक की पुष्टि भी हो रही है। बावजूद इसके कॉलेज में कार्डियोलॉजिस्ट और सुपर स्पेशलिटी सुविधाएं न होने से मरीजों को हायर सेंटर के लिए रेफर करना पड़ रहा है। आंकड़ों के अनुसार, हर वर्ष करीब 250 हार्ट अटैक मरीजों को प्राथमिक उपचार के बाद गोरखपुर या लखनऊ रेफर करना पड़ा है। वहीं, लगभग 1800 मरीज सालभर में हृदय रोग के लक्षणों के साथ मेडिकल कॉलेज इलाज के लिए पहुंचते हैं।
जांच के बाद गंभीर स्थिति होने पर उन्हें तत्काल रेफर कर दिया जाता है जबकि सामान्य लक्षण वाले मरीजों का इलाज मेडिसिन वार्ड में किया जाता है। सप्ताह में चार से पांच मरीजों को तत्काल रेफर करना पड़ता है। एंबुलेंस, दूरी और इलाज में लगने वाला समय कई बार मरीज की जान पर भारी पड़ जाता है।
जंक फूड और तनाव बन रहे बड़ी वजह : चिकित्सकों के अनुसार बढ़ता कोलेस्ट्रॉल, अनियमित दिनचर्या, जंक फूड का अत्यधिक सेवन और मानसिक तनाव हार्ट अटैक के प्रमुख कारण बनते जा रहे हैं। पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों में बढ़ता तनाव भी दिल की बीमारियों को बढ़ावा दे रहा है। समय पर जांच, संतुलित खान-पान और तनावमुक्त जीवनशैली से हार्ट अटैक के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
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टल रही सर्जरी : सर्जरी विभागाध्यक्ष डॉ. सीबी पांडेय ने बताया कि ब्लड प्रेशर और हार्ट से जुड़ी समस्याओं के कारण हर महीने 12 से 15 सर्जरी टालनी पड़ती है। कई मरीजों को मेडिसिन विभाग में रेफर किया जाता है जबकि कुछ को बाहर भेजना मजबूरी बन जाती है। यह समस्या विशेषकर 50 वर्ष से अधिक उम्र के मरीजों में अधिक देखी जा रही है।
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