हिंदी विभाग द्वारा आयोजित विद्वत वक्तव्य कार्यक्रम का हुआ आयोजन
सिद्धार्थनगर। शब्द की साधना के क्रम में संस्कृत की परंपरा में परा, पश्यंती, मध्यमा और वैखरी चर्चा का विशेष महत्व है। शब्द को समझना भी एक साधना है। यह बातें बुधवार को सिद्धार्थ विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग में हिंदी के प्रख्यात कवि-आलोचक प्रो. बजरंग बिहारी तिवारी ने कही। वे हिंदी विभाग द्वारा आयोजित विद्वत वक्तव्य कार्यक्रम में शब्द, साहित्य और मनुष्य विषय पर अपनी बातें रख रहे थे।
उन्होंने बताया कि आयोजित शब्दों के प्रकट व्यवहार से पहले प्रस्तोता को शब्दों के जिस दार्शनिक गलियारे से गुजरना होता है, वहां उसकी शब्द साधना उसे दृष्टि प्रदान करती है। उन्होंने जयशंकर प्रसाद की कृति में व्यक्त पर्यावरण विषयक चिंता के समसामयिक महत्व की चर्चा की और कहा कि आज पर्यावरण संरक्षण हमारे लिए बड़ी चुनौती है और इसे स्वीकारना हमारी जिम्मेदारी भी है। दूषित होती पर्यावरणीय स्थितियों के कारण साहित्य और पाठक की आने वाली पीढ़ियों के मध्य संवाद होना कठिन होता जा रहा है, यह विषम स्थिति हमारे गौरवशाली मध्यकालीन साहित्य के महत्व को समझने-बताने और पढ़ने-पढ़ाने में आने वाले समय में बड़ी बाधा पैदा कर देगी। अतिथि परिचय डाॅ. रेनू त्रिपाठी तथा स्वागत वक्तव्य हिंदी विभाग के अध्यक्ष डाॅ. सत्येंद्र कुमार दुबे ने दिया। आभार ज्ञापन पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. हरीश कुमार शर्मा ने किया।
इस दौरान प्रो. प्रकाशचंद्र गिरि, प्रो. शैलेंद्र नाथ मिश्र, डाॅ. राणा प्रताप तिवारी, डाॅ. विपिन यादव, डाॅ. राघवेंद्र सिंह आदि मौजूद रही।