छह बीएसए व पांच लिपिकों के समय में हुआ सत्यापन में खेल
बीएसए के स्टेनो और फर्जी शिक्षकों की गिरफ्तारी के बाद खुलने लगे हैं पोल
सरगना बता चुका है पांच बीएसए का नाम
पूर्वांचल में फैला है फर्जी शिक्षकों का नेटवर्क
नीरज मिश्र
सिद्धार्थनगर। बीएसए के स्टेनो हरेंद्र सिंह, लिपिक धर्मेंद्र और शिक्षक माफिया राकेश सिंह की गिरफ्तारी के बाद फर्जी शिक्षकों की पोल खुलने लगी है। स्टेनो ने एसटीएफ को जो जानकारी दी है उसके मुताबिक राकेश सिंह ने फर्जी शिक्षकों को बचाने के लिए अच्छी खासी रकम दी थी। सबसे खास बात यह है कि वह यह रकम पूर्व से ही संबंधित पटल के बाबुओं और अधिकारियों को देता रहा है। इनमें करीब छह बीएसए और पांच बाबू शामिल हैं, जिन्हें फर्जी शिक्षकों की पूरी जानकारी है। अगर एसटीएफ की जांच यहां तक पहुंचती है तो कई अधिकारी और बाबू सलाखों के पीछे होंगे।
जिले में फर्जी शिक्षकों की पूरी फौज है। इस बात की तस्दीक स्टेनो हरेंद्र सिंह ने अपने बयान में कर चुका है। इस बात को खुद बीएसए राम सिंह भी स्वीकार कर चुके हैं। विभाग के मुताबिक करीब 400 ऐसे शिक्षक हैं, जो जिले में फर्जी अंक पत्र के आधार पर नौकरी कर रहे हैं। इन शिक्षकों को विभाग के आलाधिकारी करीब 19 सालों से शह देते चले आ रहे हैं। 2000 से लेकर 2019 के बीच हुई नियुक्ति में छह बीएसए ऐसे रहे, जिन्होंने सत्यापन के नाम पर बाबुओं के साथ मिलकर बड़े खेल खेले हैं। इसके एवज में उन्होंने करोड़ों कमाए भी हैं। सूत्र बताते हैं कि बीएसए विनोद राव से लेकर कौशल किशोर, मनीराम, अरविंद कुमार पाठक, अजय कुमार सिंह के समय में जितनी भी नियुक्तियां हुईं, उनमें फर्जी शिक्षक जुगाड़ के बल पर शिक्षक बन बैठे। इनके सत्यापन का काम भी ऐसे बाबुओं को सौंपा गया, जिनकी सेटिंग माध्यमिक शिक्षक चयन बोर्ड प्रयागराज में भी बेहतर रही है। इस कड़ी में दो बाबुओं का नाम आ भी चुका है। इनमें धर्मेंद्र और सुशील कुमार श्रीवास्तव हैं। इसके अलावा तीन अन्य लिपिक जो मौजूदा समय में स्थानांतरण कराकर अपना दामन बचाने में जुटे हैं। बीएसए राम सिंह ने बताया कि मामले की जांच की जा रही है। एक भी फर्जी शिक्षक किसी भी हाल में बचने नहीं पाएंगे।
12 साल से चलता आ रहा खेल
फर्जी शिक्षकों का खेल जिले में पिछले 12 सालों से चलता आ रहा है। 2007 में हुई नियुक्ति के बाद व्यापक पैमाने पर फर्जी शिक्षक जिले में जुड़ते गए। यही वजह है कि 2008-09 में डायट कार्यालय में लगी आग में कई फर्जी शिक्षकों के दस्तावेज संदिग्ध हाल में जला दिए गए। बताया जाता है उसमें भी शिक्षक माफिया का हाथ था। यही वजह है कि एसआईटी की जांच के बाद भी आज तक यह पता नहीं लग सका कि आग कैसे लगी और कौन लगाया।
हर नियुक्ति में होती रही भर्ती
सबसे खास बात शिक्षक माफिया की यह रही है कि 2007 के बाद जितनी नियुक्तियां जिले में हुईं। उनमें हर बार फर्जी शिक्षकों की नियुक्ति होती रही। माफिया राकेश सिंह की अगर पूरी कुंडली खंगाली जाए तो कई बीएसए और लिपिक इस काम में फंसेंगे भी। गिरफ्तारी के बाद उसने चार बीएसए के नाम भी बताए थे। लेकिन वह जांच ठंडे बस्ते में चली गई।