डुमरियागंज। मोहर्रम की पहली रात पर हल्लौर गांव स्थित इमाम-ए- बारगाह बीबी सकीना में अकीदतमंदों ने मजलिस का आयोजन किया। मजलिस की शुरूआत मर्सिया पढ़कर की गई। उसके बाद अकीदतमंदों ने नौहा पढ़कर सीनाजनी की। इस दौरान पूरी रात ‘या अली या हुसैन’ की सदाएं गूंजती रही।
मजलिस में सबसे पहले हैदरे कर्रार और उनके हमनवा ने कर्बला के दर्द भरे मर्सिया को पढ़ा। उसे सुन वहां मौजूद अकीदतमंदों की आंखें नम हो गईं। मर्सिया के बाद मौलाना अजीम हैदर ने बताया कि इमाम हुसैन का मानवता के लिए दिया गया बलिदान हर इंसान के लिए मिसाल है। उसका अनुसरण करने के लिए किसी विशेष धर्म का होना अनिवार्य नहीं है। यह बलिदान आतंकवाद और अत्याचार से लड़ने का रास्ता दिखाता है। यही वजह है कि प्रत्येक मोहर्रम में इमाम हुसैन का गम मनाते हैं। उन्होंने कहा कि नौजवानों को इस्लाम समझने के लिए इल्म हासिल करना जरूरी है। कर्बला में यजीद के पास इल्म नहीं था। इस लिए उसने इस्लाम को बचाने वाले को शहीद कर दिया। मजलिस में मौलाना अजीम ने अकीदतमंदों को कर्बला के 72 शहीदों की दास्तां सुनाई। इस मौके पर काजिम रजा, आफताब रिज्वी, खादिम, सज्जू, महबूब, मार्शल, शबीह, कामयाब, संजू, मंजर, मशहूर, असकरी रिज्वी, मोहम्मद, रिंकू, इमरान आदि मौजूद रहे।