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लट्ठेबाजों ने दिवारी नृत्य से बांधी समा

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कपिलवस्तु महोत्सव की छठी रात को दीवारी पाई डंडा नृत्य की धूम रही
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अमर उजाला ब्यूरो
सिद्धार्थनगर। कपिलवस्तु महोत्सव के छठवें दिन सोमवार को बुंदेलखंड के मशहूर दीवारी पाई डंडा नृत्य को देख दर्शक झूम उठे। बुद्ध की धरती पर लाठी चलाने व खुद को बचाने की कला देखने के लिए लोगों को हुजूम उमड़ पड़ा।
कपिलवस्तु महोत्सव में दीवारी पाई डंडा नृत्य की प्रस्तुति के लिए रमेश पाल (बड़ोखर खुर्द) की अगुवाई में राष्ट्रपति से पुरस्कृत टीम के सदस्य पहुंचे हैं। उन्होंने रंग-बिरंगी पोशाकों में ढोल-नगाड़े की गूंज के बीच लाठी चलानेे की कला का हैरतअंगेज प्रदर्शन किया। हाथों में मोर पंख लिए मौनिया नाचते - कूदते रहे। दीवारी प्रस्तुति में दीवान यादव (निजामत पुरवा), रामखेलावन (अतर्रा), रामभगेश (जमरेई) समेत गुमाई, सहेवा, बिलगांव, अजीतपारा आदि टीमों ने कारनामे दिखाए। छोटकू-बड़कू (खप्टिहा) ने मंजीरे पर मनमोहक नृत्य पेश किया। लल्लूराम शुक्ल (चित्रकूट) ने बुंदेलखंडी गीत गाकर सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। साधु कुशवाहा व भुजबल यादव (महावीर का पुरवा) ने घोड़ा नृत्य के जरिये समा बांध दिया।
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इस मौके पर जिलाधिकारी कुणाल सिल्कू, एसपी डा. धर्मवीर सिंह, एएसपी मुन्ना लाल, ज्वाइंट मजिस्ट्रेट सौम्या पांडेय, आकांक्षा समिति की अध्यक्ष डा. अंकिता सहाय, उपजिलाधिकारी सदर उमेश चंद्र निगम, तहसीलदार संतोष कुमार ओझा, जिला सूचना अधिकारी आशुतोष पांडेय, डीसी मनरेगा उमेश चंद्र तिवारी, डीपीआरओ अनिल सिंह, सीओ दिलीप सिंह, अतिरिक्त सूचना अधिकारी विमलेश कुमार आदि मौजूद रहे।
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क्या है दीवारी पाई डंडा नृत्य
दीवारी पाई डंडा नृत्य मूलत: बुंदेलखंड का है। यह नृत्य नटवर भेषधारी श्रीकृष्ण की लीला पर आधारित है। बुंदेलखंड के गांव-गांव में यह नृत्य होता है। बुंदेलखंड की परंपरा को संजोए रखने के लिए दीवारी पाई डंडा नृत्य कलाकार करते आ रहे हैं।
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