श्रावस्ती। आजादी के लिए जिले के एक सौ तेरह दीवानों ने जेलों में यातनाएं झेलीं। इसमें से कुछ लोगों ने छह माह से लेकर 24 वर्ष तक की कारावास के साथ अर्थदंड को भी झेला। इसमें से कई तो ऐसे थे जो अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा जेल में बिता दिया।
आजादी के लिए जिले के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने कई बार लाठियां खाईं, जेल गए, अर्थदंड भी दिया। यहां तक कि गिरफ्तारी के 24 घंटें के अंदर ही इन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को ब्रिटिश हुकूमत ने सजा सुना दी। सजा होते ही अंग्रेज पुलिस उनके घरों पर अर्थदंड वसूलने पहुंच जाती थी। अर्थदंड न देने पर घरों में कई बार ताड़ फोड़ व मारपीट भी हुई। देखा जाए तो आजादी के दिनों में श्रावस्ती बहराइच जनपद के अंतर्गत ही आता था। लेकिन यदि आजादी के दीवानों की संख्या पर गौर करें तो उस समय करीब 210 स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। जो अंग्रेजी हुकूमत की प्रताड़ना का शिकार होकर कम से कम छह माह की कैद भुगत चुके थे। इसमें से 113 स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्रावस्ती के हिस्से में थे।
श्रावस्ती में जितने भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। उनमें से अधिकांश एक वर्ष से अधिक की कारावास भुगतने वाले थे। इनमें से कुछ का नाम स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने वाले लोगों की सूची में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। यह वह लोग हैं जिन्होंने अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा आजादी की लड़ाई में समर्पित कर दिया। यह घूम फिर कर कारावास या फिर अज्ञातवास में रहे। इनमें से अब कोई नहीं बचा है।
भिनगा में महिलाओं ने पहली बार आंदोलन में किया था प्रतिभाग
19 दिसंबर 1932 को एक झंडा जुलूस निकाला जाना था। यह झंडा जुलूस स्वयं सेवक भिनगा में भी निकालना चाहते थे। यह पहला अवसर था जब इस आंदोलन में जिले की 15 महिलाओं ने भी झंडा आंदोलन में प्रतिभाग किया था। इसमें से पांच महिलाओं को पुलिस ने गिरफ्तार करके जेल भी भेजा था। इस पूरे मामले में 290 कार्यकर्ता गिरफ्तार किए गए थे। जिनमें से 230 को छह माह से लेकर डेढ़ वर्ष तक की सजा सुनाई गई थी। शेष को मारपीट के छोड़ दिया गया था।
आंदोलनकारियों को अंग्रेजों ने भिनगा जंगल के पेड़ों में बांध दिया था
19 दिसंबर 1932 को भिनगा में एक झंडा जुलूस निकाला गया था। जिसमें आठ स्वयं सेवक शामिल हुए थे। जब यह जुलूस भिनगा के चौराहे पर पहुंचा तो अंग्रेज पुलिस इन्हें पकड़ कर कोतवाली ले आई। यहां पहले इनके साथ अमानुषिक व्यवहार किया गया। यही नहीं पिटाई के कुछ देर बाद बिना खाना दिए इन्हें सोहेलवा के जंगल मे पेड़ों पर बांध दिया गया। बाद में इन स्वयं सेवकों को जंगल में मवेशी चरा रहे चरवाहों ने छुड़ाया। इन्हीं की मदद से यह अपने घर पहुंचे।