श्रावस्ती। मिट्टी का सेहत जांचने के लिए जिले में चलाई जा रही योजना पर ब्रेक लग गया है। बीते दो वर्ष से कृषि विभाग मिट्टी जांच के नमूने नहीं ले रहा है। इसके चलते अब किसान केवल अनुमान पर ही उर्वरक का उपयोग का उपयोग खेतों में करने को विवश है। इससे मिट्टी की सेहत भी लगातार और खराब हो रही है। धरती की गोद में अनाज उपजाने वाली मिट्टी की निगरानी न होने से वह खुद ही बीमार है। इसकी जांच की व्यवस्था भी जिले में अब मुहैया नहीं है। बीते दो वर्ष से सरकार द्वारा मिट्टी जांच का कार्य बंद कर दिया गया है। इसके चलते अब खेतों में जाकर कृषि विभाग के कर्मी जांच के लिए मिट्टी के कोई नमूने एकत्र नहीं कर रहे। इससे मिट्टी की सेहत लगातार बिगड़ती जा रही है। अब मिट्टी की जांच कर उसका कोई रिपोर्ट कार्ड नही बनाया जा रहा है। इससे किसानों को इस बात की जानकारी भी नहीं मिल पा रही कि उन्हें रासायनिक खाद का प्रयोग खेत में कब और कितना करना है। इससे परेशान किसान अब अपनी मर्जी से अनुमान के आधार पर रासायनिक उर्वरक का उपयोग करने को मजबूर हैं। इससे मिट्टी की सेहत भी लगातार खराब होने लगी है।
कृषि विभाग द्वारा कुछ वर्ष पूर्वं मिट्टी जांच के जारी आंकड़े में पाया गया था कि किसानों का पेट भरने वाली मिट्टी अब स्वयं ही बीमार है। उस समय जिले में लिए गए 21951 मिट्टी नमूनों में से 12337 नमूनों का विश्लेषण कृषि विभाग ने अपने लैब में किया था। इसमें नाइट्रोजन की मात्रा दशमलव नौ के स्थान पर दशमलव एक ही पाई गई थी। ऐसे ही पोटाश प्रति हेक्टेअर 83 किलोग्राम के स्थान पर मात्र 65 किलोग्राम ही पाया गया था। जबकि जिंक बोरान व कैल्शियम सहित कई अन्य तत्वों की मात्रा मिट्टी से समाप्त मिली थी।
किसानों द्वारा खेतों में जीवश्म युक्त खाद का उपयोग नहीं किया जा रहा है। बार बार रासायनिक खादों का उपयोग कर फसल तैयार की जाती है। इसके चलते जो जीवाश्म खेतों में बचे थे वह फसलों के साथ कट चुके हैं। खेत काटने के बाद डंठल जलाने के कारण भी अवशेष बचे जीवाश्म खत्म हो जाते हैं। जीवाश्म न होने के कारण प्राकृतिक रूप से खेतों में नाइट्रोजन व अन्य पोषक तत्व भी खत्म होते जा रहे हैं।