थानेदार आरपी द्विवेदी की हत्या की जो कहानी पुलिस ने पेश की है उसमें कुछ तो लोचा है। कई ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब पुलिस के पास भी नहीं हैं।
अपनी पर्सनल कार से, सादे लिबास में बारा से शंकरगढ़ तक बदमाशों का पीछा करना एक नई कहानी की तरफ इशारा है।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि बारा एसओ अपनी कार से शहर आ रहे थे। उन्हें क्राइम मीटिंग में शामिल होना था। कौन थानेदार बिना वर्दी के अपनी पर्सनल कार से कप्तान की क्राइम मीटिंग में आता है।
क्राइम मीटिंग में वर्दी गंदी होने पर भी डांट पड़ जाती है फिर आरपी द्विवेदी को कैसी छूट मिली थी। ऐसी तमाम बातें पुलिस की कहानी को कटघरे में लाती दिख रही हैं।
दरोगा की हत्या की जो तस्वीर दिख रही है उससे इस बात की संभावना ज्यादा लगती है कि उन्हें बुलाकर मार दिया गया।
हालांकि इस कहानी को पुलिस सिरे से खारिज कर रही है। पुलिसवालों का कहना है कि मुठभेड़ हुई जबकि आसपास के लोग जवाबी फायरिंग की बात पचा नहीं पा रहे हैं।
दरोगा की पिस्टल से दो गोली चलने की बात कही जा रही है। ऐसा कारतूस कम होने की वजह से कहा जा रहा है।
दस कारतूसों में से महज आठ कारतूस मिले हैं। जबकि वहां पहुंचे लोगों ने पिस्टल खुसी होने की बात कही थी।
आरपी द्विवेदी बदमाशों का पीछा करते-करते इलाहाबाद-बांदा राजमार्ग तक पहुंच गए इसके बाद भी शंकरगढ़ और बारा की फोर्स मदद को नहीं पहुंची। जबकि अफसरों का कहना है कि दरोगा ने फोन के जरिए दोनों थानों पर बात कर फोर्स मांगी थी।
पेट्रोल पंप पर वही कार खड़ी है जिसे लूटा गया था, इसकी सटीक जानकारी कार मालिक तक कैसे पहुंची।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि कार मालिक को किसी ने फोन कर बताया तो उन्होंने आरपी द्विवेदी को फोन कर जानकारी दी।
सवाल यह उठता है कि जब एसओ के पास फोन आया तो वह क्राइम मीटिंग के लिए निकल पड़े थे। ऐसे में पेट्रोल पंप पर वह थाने की फोर्स भेज सकते थे।
बदमाशों ने दरोगा की हत्या कर दी, वह लुटेरे थे तो सरकारी पिस्टल क्यों छोड़ गए। हत्या के बाद नाकेबंदी हुई तो इंडिगो कार कहां छिपा दी गई। कई ऐसे सवाल जवाबों का इंतजार कर रहे हैं।