शामली। चुनावी समर शुरू हो गया है। मुद्दे कई हैं, कुछ ताजे हैं तो कुछ अनछुए, जो शामली विधानसभा सीट के चुनाव परिणामों को प्रभावित करेंगे। इनमें खराब कानून व्यवस्था, विकास में पिछड़ापन और ट्रैफिक जाम के साथ ही नोटबंदी भी बड़ा मुद्दा बन सकता है। चूंकि नोटबंदी के बाद पैदा हुई दिक्कतों से व्यापारी खासे नाराज रहे। जातिगत आंकड़ों के लिहाज से मुस्लिम और जाट निर्णायक साबित होंगे, तो नोटबंदी को लेकर व्यापारियों का रुख चुनावी नतीजों में उलटफेर कर सकता है।
शामली क्षेत्र में कभी गन्ना राजनीति का केंद्र होता था, मगर इस बार यह मुद्दा उतना प्रभावी दिखाई नहीं दे रहा। चीनी मिलों द्वारा बकाया मूूल्य गन्ना भुगतान न करने पर किसानों में नाराजगी तो रही, मगर अब चुनावी मुद्दा बनता नजर नहीं आ रहा है। मुद्दे और भी हैं, जिन्होंने लोगों को परेशान किया। उन मुद्दों पर भी खुला विरोध या समर्थन नहीं हो रहा, मगर अंदरूनी तौर पर माहौल जरूर बन रहा है।
नोटबंदी के बाद की दिक्कतें झेल चुके व्यापारियों ने यदि अपना रुख बदला, तो चुनाव नतीजे बदल जाएंगे। क्योंकि व्यापारी को भाजपा का परंपरागत वोट माना जाता है। वहीं, मुस्लिमों का रूझान, बसपा और सपा में से किसकी तरफ रहता है, वह भी काफी हद तक चुनावी नतीजों को प्रभावित करेगा। साथ ही जाटों को रालोद का परंपरागत वोट माना जाता है, मगर जाट किस करवट बैठेंगे, उससे भी चुनाव परिणाम बदल सकता है।