शामली: शहर में बने चाशनी और खोवे में लिपटे घेवर का स्वाद लोगों की जुबान पर खूब चढ़ा है लेकिन कोरोना के खौफ से लोग इससे दूर हो रहे हैं। हरियाली तीज पर प्रसिद्ध मिष्ठान के रूप में खाए जाने वाले घेवर की इस बार डिमांड कम है। आसपास के जनपदों एवं गांवों से मांग नहीं होने के कारण ब्रिकी का ग्राफ करीब 50 प्रतिशत तक गिर गया है। घेवर तैयार करने वाले हलवाइयों का कहना है कि स्थानीय स्तर पर भी मांग कम है लेकिन त्योहार नजदीक आते ही स्थिति में सुधार की उम्मीद है।
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दूसरे प्रदेशों में भी जाता है शामली का दूधिया घेवर
शामली: सावन माह में तैयार होने वाले घेवर की अच्छी-खासी मांग रहती है। यहां पर दूध से तैयार होने वाला घेवर स्वादिष्ट होता है। भगत जी स्वीट्स टटीरी बागपत वाले अंशुल मित्तल बताते हैं कि घेवर तैयार करते हुए घोल हाथ से कढ़ाई में डाला जाता है, जिससे वह पूरी तरह पकता है। हाथ वाला दूध का घेवर इसी क्षेत्र में ही बनता है। करीब 200 साल पहले से यह घेवर हरियाणा, पंजाब, उत्तराखंड, दिल्ली, राजस्थान तक जाता है। घेवर बनाते समय इसमें दूध भी डलता है। घी, मैदा और चीनी से बनाया जाता है। वह बताते हैं कि इस बार सावन मास में घेवर और गुजिया की बिक्री होती है। तीन प्रकार के घेवर बनाए जाते हैं। इनमें दूध वाला हाथ का घेवर, रबड़ी घेवर तथा केसर घेवर शामिल हैं। घेवर की मिठास रक्षाबंधन तक बनी रहती है लेकिन इस बार कोरोना संकट के चलते घेवर की मांग काफी कम हुई है। हर साल इन दिनों अच्छी-खासी बिक्री होती थी लेकिन इस बार करीब 50 प्रतिशत मांग कम है।
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गांवों से नहीं आ रही मांग
मिठाई विक्रेता मनीष गिरि बताते हैं कि इस बार गांवों से घेवर की डिमांड नहीं आ रही है। हर साल इन दिनों घेवर की अच्छी बिक्री शुरू हो जाती थी। ग्रामीण क्षेत्रों के विक्रेता फीका घेवर खरीदकर ले जाते थे लेकिन इस बार अभी मांग नहीं है। बिक्री में करीब 50 प्रतिशत तक की गिरावट आई है। उनका कहना है कि इन दिनों हर साल घेवर की अच्छी-खासी बिक्री शुरू हो जाती थी। इस बार घेवर के साथ ही अन्य मिठाइयों का सीजन भी फीका ही है।