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जनपद से खत्म हो गई मोटे अनाज की खेती

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शामली। पुराने समय में खाया जाने वाला मोटा अनाज अब जिले में नहीं उगाया जाता। गेहूं और चावल के सामने अन्य खाद्यान्न का रकबा नाममात्र रह गया है, जबकि गन्ने के सामने गेहूं और चावल का क्षेत्रफल भी कम होता जा रहा है।
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खाद्यान्न के रूप में प्रयोग की जाने वाली मक्का, बाजरा, चना एवं जौ आदि की खेती से किसानों ने लगभग मुंह मोड़ लिया है। जनपद में मक्का और बाजरा केवल पशुओं के चारे के लिए उगाया जा रहा है। इनकी फसल को पकाकर खाद्यान्न नहीं बनाया जाता। खाने के लिए गेहूं और धान ही उगाया जा रहा है। पिछले पांच वर्षों के आंकड़ों पर गौर करें तो गेहूं का रकबा घटा है, जबकि धान की स्थिति लगभग पुरानी ही चल रही है। जो किसान पहले से धान उगाते आ रहे हैं वही अब भी उगा रहे हैं। इसका रबका बढ़ा नहीं है।
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ज्वार और चना हो गए शून्य
जिले में ज्वार और चने की खेती लगभग शून्य हो गई है। इसके साथ ही जौ भी कुछ किसान गेहूं के साथ ही उगा लेते हैं। अलग से जौ की खेती नहीं की जाती।
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बाजार के हिसाब से उगाते हैं फसलें
जलालाबाद क्षेत्र के किसान राजपाल सैनी का कहना है कि पहले किसान अपने खाने के लिए फसल उगाते थे लेकिन अब बाजार की मांग के हिसाब से उगाते हैं। 40-50 साल पहले तक चना, मक्का, बाजरा जैसे मोटे अनाजों खूब प्रयोग होते थे। दलहन और तिलहन भी खूब होता था, लेकिन जैसे-जैसे किसान बाजार की ओर झुकते गए उन्होंने दूसरी दूसरी फसलों पर ध्यान देना शुरू कर दिया। किसान नीटू चौधरी बताते हैं कि लोगों की खानपान की आदतें बदल गईं हैं। अब कोई मक्का, चने, बाजरे की रोटी खाना पसंद नहीं करता तो किसानों ने भी इसे उगाना बंद कर दिया है। गेहूं और चावल की मांग ज्यादा है, इसलिए वही उगाते हैं।
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विभिन्न खाद्यान्न का रकबा हेक्टेयर में
वर्ष- गेहूं - धान - मक्का
2015-16- 51015 - 21570- 70
2016-17- 50100- 21600- 71
2017-18- 49500- 20945- 69
2018-19- 49110- 21480 - 65
2019-20- 48973- 21400- 60
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