बताया कि कर्नल रविंद्रन के नेतृत्व में तोलोलिंग चोटी पर कब्जा करने का जिम्मा द्वितीय राजपूताना राइफल्स को मिला था। 12 जून 1999 की रात भीषण संघर्ष के बाद भारतीय सेना ने तोलोलिंग पर कब्जा कर तिरंगा फहरा दिया। इस अभियान में मेजर विवेक गुप्ता, मेजर पी. आचार्य, सूबेदार भंवरलाल सहित 12 जवान शहीद हुए। इसके बाद 28 जून की रात सेना ने थ्री पिंपल्स पर सफल अभियान चलाया, जिसमें कैप्टन विजयंत थापर, कैप्टन निकू चीकू सहित कई जवान बलिदान हुए।
लिलौन निवासी पूर्व सैनिक तेजपाल सिंह ने बताया कि वह करीब 200 सैनिकों के दल के साथ युद्ध में तैनात थे। युद्ध के दौरान उनके दो साथी जवान शहीद हो गए, लेकिन भारतीय सेना ने पीछे हटने के बजाय दुश्मन को करारा जवाब दिया। वहीं, चूनसा निवासी नायक हवलदार लोकेंद्र मलिक युद्ध के दौरान घायल होने के बावजूद मोर्चे पर डटे रहे।
तेजपाल सिंह ने बताया कि 9 जून 1999 की आधी रात को तोलोलिंग पर हमला करने का आदेश मिला था और 12 जून को पहली बड़ी जीत मिली। इसके बाद सेना ने एक-एक कर दुश्मन के कब्जे वाली चोटियों को मुक्त कराया। बंतीखेड़ा निवासी संजय ने बताया कि उन्होंने दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब दिया।
पूर्व सैनिक विदेश मलिक ने बताया कि उनकी भर्ती कारगिल युद्ध के दौरान हुई थी। युद्ध समाप्त होने के बाद जब वह कारगिल पहुंचे तो उन्हें बताया गया कि भारतीय सेना ने तोलोलिंग के बाद थ्री पिंपल्स पर भी ऐतिहासिक विजय प्राप्त की थी।
27 साल बाद भी नहीं बना कारगिल शहीद स्मारक
कारगिल विजय के 27 वर्ष बाद भी शामली में शहीदों और वीर सैनिकों की स्मृति में कोई शहीद स्मारक नहीं बन सका है। पूर्व सैनिक लोकेंद्र मलिक और विदेश मलिक ने बताया कि संगठन कई बार जिला प्रशासन से शहीद स्मारक के लिए भूमि की मांग कर चुका है।
तत्कालीन जिलाधिकारी ने भूमि उपलब्ध कराने का आश्वासन भी दिया था, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। स्मारक नहीं होने के कारण शामली के पूर्व सैनिकों को कारगिल विजय दिवस पर श्रद्धांजलि देने के लिए पानीपत जाना पड़ता है।