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पार्टी से ज्यादा प्रत्याशी को देते रहे तवज्जो

Sun, 15 Jan 2017 12:14 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
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कैराना सीट। - फोटो : प्रतीकात्मक
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आनंद प्रकाश 
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शामली। जिले की वीआईपी सीट कैराना में वर्ष 1957 से 1974 तक कांग्रेस हर चुनाव में मुकाबले में रहती थी। इसके बाद यहां राजनीतिक दलों से ज्यादा शख्सियत को तरजीह दी जाने लगी। तब से कैराना की राजनीति के दो ही केंद्र रहे। एक हुकुम सिंह तो दूसरा हसन परिवार। 

आजादी के बाद से अब तक हुए 16 चुनाव और एक उपचुनाव में सात बार हुकुम सिंह तो दो बार मुनव्वर हसन तथा 2014 के उपचुनाव में उनका बेटा नाहिद हसन विधायक बन चुका है। हुकुम सिंह 1974 में पहली बार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीते। इसके बाद 1977 में जनता पार्टी के बशीर अहमद ने उन्हें परास्त कर दिया तो 1980 में हुकुम सिंह ने जनता पार्टी (सेक्यूलर) के टिकट पर चुनाव लड़कर जीत दर्ज की थी। लेकिन 1985 में वह फिर से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में जीते।
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इसके बाद हुए पलटवार में 1989 में निर्दलीय प्रत्याशी राजेश्वर बंसल ने हुकुम सिंह को हराया। उनकी हार का यह सिलसिला 1993 तक जारी रहा और 1996 में हुकुम सिंह ने कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था। उसके बाद से 2012 तक वह भाजपा प्रत्याशी की हैसियत से ही कैराना सीट से चुनाव जीतते आए हैं। 2014 लोकसभा चुनाव में हुकुम सिंह भाजपा टिकट पर सांसद बने तो कैराना सीट खाली हो गई। इसके चलते उपचुनाव में मुनव्वर हसन के बेटे नाहिद हसन ने जीत दर्ज की। 
 
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