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काम की तलाश हर दिन, मिलता है कभी-कभी

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अपने परिवार के साथ प्रवासी श्रमिक दुर्गेश कुमार कोरी - फोटो : SHAMLI
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काम की तलाश हर दिन, मिलता है कभी-कभी
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अंकित सैनी
थानाभवन। दो वक्त की रोटी की खातिर परिवार से दूर पंजाब की फैक्टरी में काम कर रहे प्रवासी मजदूर अपने गांव लौटने के बाद रोजी रोटी को तरस गए हैं। लॉकडाउन होने के कारण यहां कोई काम नहीं मिल रहा। फिर भी सुबह काम की तलाश में निकलते हैं। कभी कभी तो सुबह से शाम हो जाती है और मजबूरी में उन्हें घर खाली ही लौटना पड़ता है। कुछ प्रवासी मजदूरों का कहना है कि अगर यही हालात रहे तो उनके पास दोबारा वापस लौटने के सिवा कोई रास्ता नहीं रहेगा। अपने घर वापस आए इन प्रवासियों से बातचीत कर हाल जाना। पेश है रिपोर्ट
वापसी के सिवा कोई रास्ता नहीं सूझ रहा
जलालाबाद के मोहल्ला जामिल अली निवासी ताराचंद सैनी पंजाब के जिला बरनाला के महलकलां में एक चावल की मिल में काम करता था। ओवरटाइम करके 12-13 हजार रुपये मिल जाते थे। 8 से 10 हजार रुपये महीना घर भेजता था। सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन लॉकडाउन लगने पर काम बंद हुआ तो अपने गांव लौट आया। उसने बताया कि यहां आकर उसे काम नहीं मिल रहा। बडे़ काश्तकारों के यहां चक्कर काटता है। कभी 100-200 का काम मिल जाता है, किसी दिन खाली रहना पड़ता है। परिवार का खर्चा चलाना मुश्किल हो गया। लॉकडाउन खुला तो फिर से पंजाब पर काम के लिए जाने के सिवा कोई रास्ता नहीं मिल रहा।
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सुबह निकल जाता है काम की तलाश में
जलालाबाद निवासी बंटी कश्यप भी पंजाब के महलकलां स्थित चावल की मिल में ही काम करता था। 13-14 हजार रुपये मिल जाते थे। 10 हजार घर भेजता था। परिवार में उसके अलावा माता-पिता, पत्नी एक बच्चा है। लॉकडाउन में काम बंद हो गया। कई दिन वहां भटका मगर कोई काम नहीं मिला। मजबूर होकर गांव लौटा है, लेकिन यहां और बुरी हालत है। कोई काम नहीं मिल रहा। काम के चक्कर में रोज सुबह घर से निकलता है। कोई कस्बे में दुकान, मकान का छोटा मोटा काम बता देता है तो कभी कभी 150-200 रुपये मिल जाते हैं। वरना दोपहर बाद खाली हाथ लौट आता है। परिवार की रोटी कैसे चलेगी समझ नहीं आ रहा।
परिवार परेशान, कैसे चले घर
कस्बे के मोहल्ला आर्यनगर निवासी दुर्गेश कुमार कोरी भी पंजाब के महलकलां स्थित चावल की मिल में ही चावल सुखाने का काम करता था। दुर्गेश ने बताया कि वहां 9-10 हजार रुपये का काम था। उसकी अभी शादी नहीं हुई है। परिवार बुजुर्ग माता-पिता हैं। उनके लिए गांव में हर महीने छह हजार भेजता था, सब कुछ हंसी खुशी से चल रहा था, लेकिन लॉकडाउन के बाद घर लौटा तो रोटी के भी लाले पड़ने लगे। पूरा परिवार परेशान है क्योंकि यहां कोई काम नहीं है। दिन रात चिंता है कि घर कैसे चलेगा।
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घर चलाने को रिश्तेदार से मांगे एक लाख उधार
जलालाबाद निवासी अर्जुन कुमार ने बताया कि वह भी पंजाब के महलकलां स्थित चावल की मिल में ही काम करता है। लॉकडाउन के बाद लौटने से उसकी मुश्किल और बढ़ गई है। बताया कि वहां 12 हजार मिलते थे और यहां खाली हैं। परिवार में बुजुर्ग माता-पिता के साथ पत्नी व दो बच्चे भी जलालाबाद में ही रहते हैं। गांव में आकर तो दूर तक कमाई का जरिया नजर नहीं आता। जमा पूंजी सब खत्म हो चुकी है। घर का चूल्हा कैसे जलेगा, बच्चों की फीस कैसे देंगे। यही चिंता सता रही है। दिन भर घूमने पर कुछ छोटा मोटा काम मिलता है लेकिन उससे घर नहीं चलता। रिश्तेदार से एक लाख उधार मांगा है आश्वासन दिया है पता नहीं देगा या नहीं। उसे भी लगता है कि काम के लिए दोबारा पंजाब जाना पडे़गा।

अपने परिवार के साथ प्रवासी श्रमिक तारा चन्द सैनी- फोटो : SHAMLI

प्रवासी श्रमिक अर्जुन कुमार अपनी मा के साथ- फोटो : SHAMLI

अपने परिवार के साथ प्रवासी श्रमिक बंटी कश्यप- फोटो : SHAMLI

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