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सैनिकों की शहादत का बदला ले सरकार, चीन को सिखाएं कड़ा सबक

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कांधला क्षेत्र के गांव खंद्रावली के राजकुमार - फोटो : SHAMLI
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संजीव शर्मा
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शामली। भारत-चीन की सीमा पर बढ़े तनाव और हिंसक झड़पों को लेकर 1962 के युद्ध में शहीद हुए गांव खंदरावली निवासी रामचंद्र सिंह की यादें ताजा हो गई। शहीद रामचंद्र सिंह के छोटे भाई व परिवार के सदस्यों ने कहा कि सरकार भारतीय सैनिकों की शहादत का बदला ले और चीन को कड़ा सबक सिखाए।
जनपद के गांव खंदरावली निवासी रामचंद्र सिंह चीन के साथ 1962 के युद्ध में शहीद हो गए थे। वह अविवाहित थे। उनके बड़े भाई बाबूराम भी अविवाहित थे। उनका करीब 18 साल पहले निधन हो चुका है। सबसे छोटे भाई 75 वर्षीय राजकुमार उर्फ राजू गांव में पत्नी, बेटे और परिवार के साथ रहते है। राजकुमार के दो बेटे सुधीर और सोमवीर है। सुधीर गांव में रहकर खेतीबाड़ी करते है जबकि छोटा सोमवीर गुरुग्राम में प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता है और अपनी पत्नी और बच्चे के साथ वहीं रहता है। सुधीर के पत्नी दो लड़की और एक लड़का है। राजकुमार से बाचतीत की तो वे अपने भाई रामचंद्र को याद कर भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि हाल में सीमा पर हुई झड़पों में जब भारतीय सैनिकों के शहीद होने का पता चला तो उन्हें अपने भाई की याद ताजा हो गई। उनके बड़े भाई ने देश के लिए बलिदान दिया, यह उनके लिए गर्व की बात है, लेकिन उनके चले जाने का गम हमेशा रहेगा। उन्होंने कहा कि चीन ने जो कायराना हरकत की है, उसका जवाब चीन को मिलना ही चाहिए। सरकार को कड़ा कदम उठाना चाहिए।
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शहीद रामचंद्र के भतीजे सुधीर ने कहा कि चीन सीमा पर हिंसक झड़पों में शहीद हुए सैनिकों का सरकार बदला ले और चीन को कड़ा सबक सिखाए। यही शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
आठ साल तक देश की सेवा करते हुए शहीद हुए थे
खंदरावली निवासी राजकुमार ने बताया कि जब उनके भाई शहीद हुए तब वे करीब 14 साल के थे। इतना याद है कि उन्होंने सेना में भर्ती होकर आठ साल तक देश की सेवा की और मातृभूमि की रक्षा करते हुए चीन के साथ 1962 के युद्ध में शहीद हो गए थे।
प्राथमिक विद्यालय दिलाता है शहीद की याद
शामली। रामचंद्र सिंह के शहीद होने के बाद प्रशासन ने गांव के प्राथमिक विद्यालय का नाम शहीद रामचंद्र प्राइमरी स्कूल नंबर एक कर दिया था, जो आज भी उनकी याद दिलाता है। गांव खंदरावली के पूर्व नायक ईश्वरपाल फौजी ने बताया कि शहीद के नाम पर विद्यालय का नाम रखा गया है। विद्यालय पर शहीद का नाम छोटे अक्षरों में लिखा है, इसे बड़े अक्षरों में लिखा जाए तो और भी अच्छा रहेगा।
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एक साल बाद ट्रेन से पहुंचे थे कपड़े
शामली। शहीद रामचंद्र के भाई राजकुमार ने बताया कि 1962 के युद्ध में शहीद होने का उन्हें एक साल बाद पता चला था। उन्होंने बताया कि उन्हें पहले तो चिट्ठी से उनके लापता होने की जानकारी मिली थी। उस समय न फोन था और न ही टीवी थे। इसके एक साल बाद परिवार के लोगों को खंदरावली स्टेशन पर बुलाया गया। उन्हें बताया गया था कि ट्रेन में उनके कपड़े आए है। इसके बाद उनके शहीद होने की जानकारी मिल सकी थी।

कांधला क्षेत्र के गांव खंद्रावली में शहीद रामचंद्र का भाई राजकुमार परिवार के साथ- फोटो : SHAMLI

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