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बुजुर्गों की राय : अब अपनी मर्जी से वोट डालते हैं बच्चे

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अमर उजाला ब्यूरो
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शामली। एक समय था जब चुनाव के दौरान गलियों में हल्ला मचता था। बच्चों की टोलियां बिल्लों के लिए नारे लगाती थीं। सड़कों पर रैलियां और जलसे होते थे, लेकिन समय के साथ-साथ सब बदल गया। पहले और आज के चुनाव में कितना बदलाव हुआ है। इस बारे में अमर उजाला टीम ने शहर के अलग-अलग मोहल्लों में जाकर कुछ बुजुर्गों से बात की। पेश है रिपोर्ट...

जहां बड़ों ने कह दिया वहीं डालते थे वोट
कांबोज कालोनी निवासी 70 वर्षीय बाला देवी कहती हैं कि 40 साल पहले तो उन्हें ये भी पता नहीं होता था कि चुनाव में खड़ा कौन है। कितने लोग चुनाव लड़ रहे हैं। चुनाव के दिन सुबह घर के बड़े लोग घर में सलाह करते थे। महिलाओं को जिसके निशान पर मोहर लगाने को कहते थे, उस पर मोहर लगाकर आ जाती थी आजकल मोबाइल, टीवी, अखबार इतने ज्यादा हो गए कि चुनाव लड़ने वाले हरेक आदमी का पता चल जाता है। घर में बाप और बेटे की अलग अलग वोट जाती हैं।
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अब पहले जैसी रौनक नहीं
रणजीत नगर निवासी महावीरी कहती हैं कि पहले घर और आस पड़ोस की महिलाएं बुग्गी में बैठकर गीत गाते हुए वोट डालने जाती थी। चुनाव लड़ने वाले या उनके लोग दरवाजे पर वोट मांगने आते थे। घर के बड़े ने जहां वोट कहीं वहीं डाल आते थे। अब तो कोई भूला भटका आ गया तो ठीक वरना कोई वोट मांगने भी नहीं आता। अब तो मोबाइल में ही वोट देने की बात कहते हैं। पहले रात-रात भर माइक से प्रचार होता था, पर अब ये सब नहीं है। पहले से ज्यादा राहत है।

लाल पगड़ी वाले चौकीदार की होती थी अहमियत
धीमानपुरा निवासी बुजुर्ग उदयपाल धीमान कहते हैं कि 70-80 के दशक में चुनाव में इतनी पुलिस फोर्स नहीं लगती थी। वोटिंग के वक्त सुरक्षा के लिए लाल रंग की पगड़ी बांधकर गांव का चौकीदार ही व्यवस्था देखता था। उसकी काफी अहमियत होती थी। मतदान केंद्र पर केवल दो या तीन पुलिस वाले होते थे। नामांकन वाले दिन सड़कों पर जाम लगता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है। हालांकि लोगों की परेशानियां कम हुई हैं, लेकिन गली मोहल्लों में वो पहले जैसी रौनक गायब हो गई है।

जिसके बिल्ले मिले, उसके नारे लगाए
बैंड मार्केट निवासी महावीर सिंह कहते हैं कि चुनाव से एक महीने पहले ही गलियों में शोर मचने शुरू हो जाते थे। नामांकन होते ही गलियों में बैठकें होने लगती थी। प्रत्याशियों के बस्तों पर बच्चों की बिल्ले के लिए भीड़ लगती थी। जिसके बिल्ले मिले उसके नारे बच्चे गलियों में लगाते थे। पहले चुनाव के वक्त खूब रौनक होती थी जो अब गायब है।
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ठप्पे बाजी पर कसी लगाम
रेलवे रोड पर अपनी छोटी सी किराना की दुकान में बैठे बाबूराम कहते हैं कि 60 साल पहले चुनाव के दौरान बैलेट पेपर पर वोट डलती थी। जिस इलाके में जिस बिरादरी का दबदबा होता था। वहां के बूथ पर उनका ही रौब रहता था। ठप्पे बाजी भी होती थी लेकिन अब वोटिंग मशीन से वोट डलते हैं। ठप्पे बाजी तो कम हुई है लेकिन गली मोहल्लों की चहल पहल कम हो गई है।
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