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चुनावी एजेंडा में नजर नहीं आ रहे शहर के ज्वलंत मुद्दे

Fri, 17 Nov 2017 12:25 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो शाहजहांपुर।
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नगर पाल‌िका - फोटो : अमर उजाला
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सीवर लाइन, अतिक्रमण, जाम, डेयरी, गंदगी बड़ी समस्याएं
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प्रचार के दौरान सिर्फ वोट मांगने पर फोकस कर रहे प्रत्याशी

शहर की सरकार बनाने के लिए मतदान में अब ज्यादा दिन नहीं शेष नहीं हैं। 26 नवंबर को मतदान और एक दिसंबर को मतगणना के बाद शहरी सरकार पर स्थिति साफ हो जाएगी। चुनाव मैदान में उतरे प्रत्याशी प्रचार में पूरी ताकत झोंके हुए हैं। डोर-टू-डोर संपर्क हो या फिर वोट पाने का कोई और हथकंडा सभी आजमाए जा रहे हैं। चुनाव प्रचार के शोर के बीच शहर के ज्वलंत मुद्दे पीछे छूटते नजर आ रहे हैं। 20 साल से फंसा पड़ा सीवर लाइन का पेच हो या फिर शहर में चल रहीं अवैध डेयरी, अतिक्रमण, जाम और गंदगी जैसे मुद्दे चुनावी शोर में दबकर रह गए हैं। इतना ही नहीं मतदाता भी चुप्पी साधे हुए है। सीवर लाइन का काम 20 साल से अटका पड़ा है। नालों पर कब्जे हो गए हैं। गौर करने वाली बात यह है कि चुनाव मैदान में उतारे प्रत्याशी ऐलान तो बड़े-बड़े कर रहे हैं, लेकिन अपनी घोषणा को वह किस तरह पूरा करेंगे इसकी कोई प्लानिंग उनके पास नहीं है। ये अहम मुद्दे आज भी समस्या बने खड़े हैं।

ये हैं छोटे मगर अहम मुद्दे

मुद्दा-एक
शहर में सड़कों पर घूमते जानवर और डेयरियां बड़ी समस्या हैं। जानवरों की वजह से जगह-जगह जाम लगा रहता है। अवैध डेयरियों के खिलाफ कार्रवाई की बात कई बार हुई, लेकिन कभी कोई नतीजा सामने नहीं आया। गर्रा और खन्नौत नदियों में दिन भर सैकड़ों भैंस बैठी रहती हैं। इससे नदियों में प्रदूषण होता है।
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मुद्दा-दो
सफाई के नाम पर मोहल्लों में रखे टूटे-फूटे कूड़ेदान स्थिति को खराब कर रहे हैं। कूड़ेदान से कूड़ा नाले-नालियों में चला जाता है। इससे नाले-नालियां चोक हो जाते हैं। मतदाता भी इस मुद्दे को प्रत्याशियों के सामने नहीं उठा रहे। चुनावी शोर के बीच यी अहम मुद्दा भी फीका दिख रहा है। कई मोहल्लों में गंदगी से बुरा हाल है।
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मुद्दा-तीन
जनता जाम से निजात चाहती है। शहर के प्रमुख चौराहों पर घंटों जाम का झाम लगा रहता है। चुनाव जीतने के बाद जाम की समस्या से निजात के लिए क्या उपाय किए जाएंगे यह कोई बताने को तैयार नहीं। जबकि यह सब जानते हैं कि जाम की समस्या लगातार विकराल रूप लेती जा रही है।
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मुद्दा-चार
सीवर लाइन 20 साल के बाद भी शहर के लिए सपना बनी हुई है। करीब 20 साल पहले 1998 में सीवर लाइन निर्माण का काम शुरू हुआ था। यह काम अधर में ही लटक गया। सीवर लाइन प्लांट के लिए आई मशीने भी कबाड़ हो चुकी हैं। प्लांट परिसर का इस्तेमाल पशुओं को बांधने के काम आ रहा है। गौर करने वाली बात यह है कि 20 साल के दौरान कई चुनाव हुए। सीवर लाइन का काम आगे बढ़ाने का मुद्दा भी उठा, लेकिन काम आज तक आगे नहीं बढ़ सका। 
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मुद्दा-पांच
शहर के कई ऐसे इलाके हैं जहां सड़कों किनारे ऑटोमोबाइल्स वर्कशॉप चल रहे हैं। सड़कों पर गाड़ियों की न सिर्फ मरम्मत की जाती है बल्कि गाड़ियों को यहां धोया भी जाता है। कई बार हादसे भी होते हैं। वोट बैंक के लालच में के चलते ऐसे अवैध वर्कशॉप चुनावी एजेंड़ा से दूर ही रहते हैं। इस बार भी चुनावी शोर में यह मुद्दा फीका है।
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मुद्दा-छह
शहर के मुख्य बाजारों की सड़कें अतिक्रमण की वजह से संकरी हो गई हैं। शहर को साफ-सुथरा रखने के साथ अतिक्रमण मुक्त रखने का जिम्मा भी नहीं पालिका का होता है। पांच साल के बाद फिर से चारो ओर चुनावी शोर है। प्रत्याशी चुनाव मैदान में डटे हुए हैं। गौर करने वाली बात यह है कि शहर को अतिक्रमक मुक्त करने की कार्ययोजना भी किसी प्रत्याशी के पास नहीं है। 
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मुद्दा-सात
शहर में कई स्थानों पर सार्वजनिक शौचालय बने हुए हैं। स्वच्छ भारत अभियान के तहत सरकारें भी शौचालय निर्माण पर फोकस कर रही है। कलक्ट्रेट परिसर में बने शौचालयों की दशा किसी से छिपी हुई नहीं है। शौच और लघुशंका के लिए लोगों को यहां-वहां भटकना होता है। हालांकि, शहर में कुछ स्थानों पर नए सिरे से शौचालयों का निर्माण कराया जा रहा है, लेकिन इनके रख-रखाब का मुद्दा कोसों दूर है।
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मुद्दा-आठ
शहर में कई स्थानां पर नालों की पुलियां टूटी हुई हैं। ऐसा नहीं है कि पिछले सालों में कोई काम नहीं हुआ। काफी काम हुए जरूर लेकिन छोटे और अहम कामों को ज्यादा तबज्जो नहीं दी गई। टूटी पुलिया कई बार हादसों का कारण बन जाया करती हैं। 
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मुद्दा-नौ
शहर में कई ऐसे स्थान हैं जहां घनी आबादी के बीच खुले में ट्रांसफार्मर रखे हुए हैं। कई बाइ इनमें विस्फोट तक हो जाता है। ऐसे में जान-माल को खतरा बना रहता है। शहर की जिम्मेदारी नगर पालिका की होती है। खुले में रखे ट्रांसफार्मरों को कैसे कवर्ड कराया जाएगा, यह कोई बताने को तैयार नहीं।
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