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चुनावी रणनीति में भाजपा से पटखनी खा गई सपा

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शाहजहांपुर में भाजपा प्रत्याशी की जीत पर तिरंगा लेकर खुशियां मनाते समर्थक । संवाद - फोटो : SHAHJAHANPUR
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शाहजहांपुर। भाजपा के क्लीन स्वीप के पीछे की वजह जहां राजनीतिक कौशल था वहीं मुख्य विपक्षी सपा हर दांव पर मात खा बैठी। सपा ने जिसे बाहुबली समझा, वे दगे पटाखे निकले। पिछले 30 साल में पहला मौका है जब सपा के पास जिले में एक भी विधानसभा सीट नहीं होगी। वहीं पहली बार भाजपा ने जलालाबाद समेत सभी छह सीटों पर विजय पताका फहराई है। ऐसा पहली बार है जब किसी पार्टी की झोली में जिले की सारी सीटें होंगी।
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पंचायत चुनाव था सेमीफाइनल
2017 में जब पांच सीटें पार्टी ने जीती थीं तो इस चुनाव में एक कदम आगे बढ़कर क्लीन स्वीप का इरादा बना लिया था। तब की हारी जलालाबाद सीट पर भाजपा ने गोटें बिछानी शुरू कर दी थीं। जिले में क्लीन स्वीप का खाका त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के दौरान ही भाजपा ने तय कर लिया था। निर्विरोध जिला पंचायत अध्यक्ष जिताने के साथ ही सभी ब्लॉक प्रमुख भी पार्टी के जितवा लिए थे। अब असल परीक्षा विधानसभा चुनाव में थी।
शाहजहांपुर जिले में अभूतपूर्व प्रदर्शन के लिए प्रदेश नेतृत्व ने भी कोई कोरकसर नहीं छोड़ी थी। जिले में दो कैबिनेट मंत्री के साथ ही कई अहम ओहदे भाजपाइयों को मिले थे। टिकट वितरण में भाजपा ने पुराने विजेताओं पर ही दांव चला। सिर्फ तिलहर और जलालाबाद में प्रत्याशी बदलना पड़ा। टिकट न मिलने से नाराज भाजपाइयों को मैनेज करने में पार्टी सफल रही। असंतुष्ट लोगों को सरकार बनने पर एडजस्ट करने का आश्वासन काम किया और कहीं पर भाजपा प्रत्याशियों को स्पष्ट विरोध का सामना नहीं करना पड़ा।
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यहां भी चूक गई सपा
पंचायत चुनाव में जिला पंचायत अध्यक्ष के लिए विश्वसनीय प्रत्याशी न तय कर पाने वाली समाजवादी पार्टी विधानसभा चुनाव के टिकट वितरण में चूक कर बैठी। जिन रोशनलाल वर्मा और नीरज मौर्य को बड़े आत्मविश्वास के साथ पार्टी में लाकर टिकट देने की गलती का खामियाजा दोनों सीट हारकर चुकानी पड़ी। दोनों ही अनुभवी राजनीतिक खिलाड़ी पहली बार चुनाव लड़ रहे भाजपा प्रत्याशियों से मात खा बैठे। मोदी लहर में भी जलालाबाद सीट सपा की झोली में डालने वाले शरदवीर सिंह का टिकट काटना रणनीतिक तौर पर बड़ी चूक बना।
दरअसल रोशनलाल वर्मा और नीरज मौर्य को पुराने सपा नेता पचा नहीं पा रहे थे। रोशनलाल वर्मा का विरोध तो कुछ सपाइयों ने खुलेआम किया था। दरअसल दोनों की ही राजनीति सपा के विरोध में शुरू हुई थी। पुवायां में उपेंद्र पाल शुरुआती दौर में काफी सक्रिय दिखे थे लेकिन मतदान से पहले ही उन्होंने हथियार डाल दिए। चेतराम के खिलाफ बने माहौल का फायदा वह नहीं उठा सके।
कटरा से राजेश यादव की हार जरूर चौंकाने वाली रही। हालांकि वह मामूली अंतर से ही हारे। नगर सीट पर तनवीर खां अच्छा लड़े लेकिन सुरेश कुमार खन्ना के कद के आगे एक बार फिर बौने साबित हुए। ददरौल सीट पर पूर्व मंत्री अवधेश वर्मा की नाराजगी राजेश वर्मा पर भारी पड़ी। भाजपाइयों ने प्रचार-प्रसार में सपाइयों पर बढ़त हासिल की। वहीं सपा प्रत्याशी भाजपा सरकार के खिलाफ माहौल बनाने में नाकाम साबित हुए।
कहीं पर मुकाबले में नहीं दिखी बसपा-कांग्रेस
छह में से किसी भी सीट पर बसपा और कांग्रेस के प्रत्याशी मुकाबले में नहीं नजर आए। बसपा के लिए अपना कैडर वोट जुटाना भी भारी पड़ा। कटरा सीट पर कांग्रेस के मुन्ना सिंह ने थोड़ा जोर जरूर दिखाया लेकिन पार्टी का वोट न होने से मुकाबला नहीं कर सके। तिलहर से कांग्रेस प्रत्याशी रजनीश गुप्ता दमखम से जरूर लड़ते नजर आए लेकिन वह तीन हजार वोट के इर्दगिर्द रह गए। बसपा प्रत्याशी भी कैडर वोट ही पा सके। संवाद
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