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शाहजहांपुर की अनोखी होली: भैंसागाड़ी पर निकलते हैं 'लाट साहब', रंगों के साथ जूता-चप्पलों की होती है बौछार

Thu, 26 Feb 2026 05:23 PM IST
Mukesh Kumar संवाद न्यूज एजेंसी, शाहजहांपुर

सार

शाहजहांपुर में होली के दिन लाट साहब का जुलूस निकलता है। यह जुलूस अपने आप में अनोखा है। एक युवक को लाट साहब बनाकर भैंसागाड़ी पर बैठाकर शहर में घुमाया जाता है। शहर के लोग जूता-चप्पल और झाड़ू बरसाकर उसका स्वागत करते हैं। जानते हैं लाट साहब के जुलूस का इतिहास... 
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लाट साहब का जुलूस (फाइल) - फोटो : संवाद
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विस्तार
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शाहजहांपुर की होली अपने आप में अनोखी है। यहां होली पर अंग्रेजों के जमाने से लाट साहब का जुलूस निकलता आ रहा है। अपने अनूठे तरीके के लिए चर्चित लाट साहब के जुलूस का इतिहास काफी पुराना है। इसकी शुरुआत अंग्रेजों ने हिंदू-मुस्लिम एकता को खंडित करने के उद्देश्य से कराई थी। अंग्रेजों की शह पर ही तत्कालीन नवाब के अत्याचारों का बदला लेने के लिए इस जुलूस की शुरुआत हुई। आजादी के बाद इसका नाम बदलकर लाट साहब कर दिया गया। इस बार लाट साहब के जुलूस को लेकर पुलिस प्रशासन तैयारियों में जुटा हुआ है। 

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इतिहासकार डॉ.विकास खुराना - फोटो : संवाद
इतिहासकार डॉ.विकास खुराना बताते हैं कि जिले में लाट साहब का जुलूस कब शुरू हुआ। इसकी निश्चित तारीख और सन पता नहीं चलता, किंतु यह तथ्य ऐतिहासिक है कि अवध क्षेत्र के प्रभाव वश स्थानीय नवाब होली में खुलकर प्रतिभाग करते थे। शाहजहांपुर के स्थानीय इतिहास पर लिखी गई किताबें यह बताती हैं कि नवाब होली के अवसर पर न केवल रंग खेलते थे, बल्कि जुलूस के रूप में नगर भ्रमण भी करते थे। समकालीन उर्दू स्रोत बताते हैं कि नवाब अब्दुल्ला खान इनका समय 1708 से 1779 के मध्य था। वे परिवार से नाराज होकर फर्रुखाबाद चले गए थे और 1728 में वापस आए। वापस आने पर उन्होंने होली खेली और शहर का चक्कर लगाया। 

लाट साहब का जुलूस (फाइल) - फोटो : संवाद
उन्होंने बताया कि लाट साहब के जुलूस की वर्तमान प्रकृति और जूते चप्पलों की बरसात प्रतिकार स्वरूप थी। यह निश्चित ऐतिहासिक तथ्य है कि 1857 की क्रांति पूरे रूहेलखंड में तीव्रता के साथ प्रस्फुटित हुई थी। अंग्रेज अधिकारी जिले छोड़ कर भाग गए थे और स्थानीय सरकारें यहां कायम हुई। यहां तक कि ब्रिटिश जिला प्रशासन जुलूस का आयोजन स्वयं ही करने लगा। 

लाट साहब का जुलूस - फोटो : संवाद
साल 1988 में बदला जुलूस का नाम 
आजादी के बहुत दशकों तक जुलूस का यही स्वरूप बना रहा किंतु वर्ष 1988 में तत्कालीन डीएम कपिल देव की सलाह पर जुलूस का नाम नवाब साहब की जगह लाट साहब का जुलूस कर दिया। इसका उद्देश्य प्रतीकात्मक रूप से अंग्रेजी शासन का विरोध करना हो गया। शहर के हिंदू और मुसलमान दोनों ही अब इसमें शामिल होकर ब्रिटिश दमन का विरोध करते हैं। 
 

लाट साहब का जुलूस (फाइल) - फोटो : अमर उजाला
हाईकोर्ट में लगी याचिका
शहर में अनेकानेक लोग सांप्रदायिक सौहार्द के मद्देनजर इस जुलूस के विरोध में रहते हैं। वर्ष 1999 में  में कांग्रेस नेता रामनाथ बघेला ने जुलूस को रोकने के लिए हाईकोर्ट में जनहित याचिका डाली थी, किंतु उच्च न्यायालय ने इसे परंपरा मानते हुए हस्तक्षेप से इन्कार कर दिया। 

कड़ी सुरक्षा में निकलता है जुलूस - फोटो : संवाद
सिविल सेवाओं के प्रशिक्षण में पढ़ाया जाता है इसका प्रबंधन
भारतीय प्रशासनिक सेवाओं में चयनित अभ्यर्थियों के पाठ्यक्रम में भारत के तीन जुलूस पाठ्यक्रम का हिस्सा है। इनमें से एक जुलूस लाट साहब भी है। इसका प्रशासन और प्रबंधन कैसे किया जाता है, यह नव प्रशिक्षु अधिकारियों को पढ़ाया जाता है।
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लाट साहब का जुलूस (फाइल) - फोटो : संवाद
कोतवाल देते हैं सलामी
होली पर बड़े लाट साहब अपने नगर भ्रमण के दौरान शहर कोतवाली पहुंचते हैं। जहां उन्हें कोतवाल सलामी देते हैं। वे कोतवाल से वर्ष भर हुए अपराध के रिकॉर्ड्स मांगते हैं जिससे बचने के लिए शहर कोतवाल उन्हें नेग स्वरूप उपहार प्रदान करते हैं।

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