एक विवाह समारोह में एकजुट हुए माटा परिवार के सदस्य। संवाद
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शाहजहांपुर। देश की आजादी के समय विभाजन की त्रासदी झेल कर पंजाब से विस्थापित होकर यहां आए साधारण परिवार के दर्शन सिंह माटा ने अपने बेटों के सहयोग से साधारण कारोबार शुरू किया। परिवार की माली हालत थोड़ी सुधर पाई कि वर्ष 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या से देश में सिखों के खिलाफ भड़के दंगों में माटा परिवार के घर और संपत्तियों को फिर निशाना बनाया गया। आगजनी और तोड़फोड़ में काफी नुकसान उठाने के बाद इस परिवार के सदस्यों ने अपनी कर्मठता के बल पर फिर से न सिर्फ कारोबार खड़ा करके उसे नई ऊंचाइयां दीं, समाज सेवा के क्षेत्र में भी अपनी अलग पहचान बनाई।
परिवार की मुखिया कमलेश कौर माटा अतीत की यादों का पिटारा खोलते हुए बताती हैं कि सन 1947 में बंटवारा होने से पहले उनके ससुर दर्शन सिंह माटा पाक अधिकृत पंजाब के बारबटन जिले में रहते थे जो कि सिखों के प्रमुख धार्मिक स्थल ननकाना साहिब के करीब है। पति गुरुवचन सिंह उस वक्त मुश्किल से ढाई-तीन साल के रहे होंगे। विभाजन के वक्त दोनों देशों में मारकाट मची तो ससुर उन्हें और सास सुमित्रा कौर को लेकर शाहजहांपुर आ गए। शुरुआती दिन बेहद तंगहाली में गुजरे। अपनी मेहनत से थोड़ी पूंजी जुटाकर ससुर दर्शन सिंह ने हैंडपंप की बोरिंग का काम शुरू किया और इस काम में मजदूरों के साथ खुद अपना पसीना बहाने लगे।
उन्होंने बताया कि उस दौरान सिर छिपाने को एक अदद छत भी बड़ी मुश्किल से मिली। जैसे-तैसे मकान बनाया। समय बीतने के साथ दर्शन सिंह के तीन बेटे दलजीत सिंह, गुरमीत सिंह और जगजीत सिंह हुए। बड़े होने पर गुरुवचन सिंह से उनका विवाह हुआ, लेकिन वह केवल गृहणी के दायरे तक सीमित रहीं। दर्शन सिंह और उनके सभी बेटों ने मिलकर काम बढ़ाने में दिन-रात एक कर दिया। पहले मशीनरी मार्केट में स्पेयर पार्ट्स की दुकान खोली और काम चल निकलने पर अन्य कई व्यवसाय शुरू किए, लेकिन वर्ष 1984 के दंगों ने फिर इस परिवार पर वज्रपात किया। उन्मादी भीड़ ने उनके मकान में आग लगा दी और गृहस्थी का सारा सामान लूट ले गई।
कमलेश कौर के अनुसार उस दौरान पुलिस ने परिवार को दंगाइयों से बचाते हुए बड़ी मुश्किल से घर से निकाला। कई दिन तक परिवार के सभी सदस्य शहर में इधर-उधर परिचितों के यहां शरण लिए रहे और माहौल शांत होने पर घर आकर देखा तो पूरा घरौंदा बिखर चुका था। इसके बावजूद दर्शन सिंह, उनके बेटों और पौत्रों ने जीवटता की मिसाल पेशकर फिर से मेहनत के बल पर अपना कारोबार शुरू किया।
आज इस परिवार के सदस्य वाहन और पेट्रोलियम के कारोबार से जुड़कर न सिर्फ शहर बल्कि आसपास के जनपदों में अपनी अलग पहचान बना चुके हैं। यही नहीं, धार्मिक और सामाजिक प्रवृत्ति के दर्शन सिंह की विरासत को आगे बढ़ाते हुए कमलेश कौर माटा भी कई संस्थाओं से जुड़कर सामाजिक भलाई के काम कर रही हैं। वर्ष 1986 में सुमित्रा कौर और वर्ष 2009 में दर्शन सिंह माटा संसार से विदा ले चुके हैं, लेकिन उनकी कर्मठता की मशाल आज भी पूरा परिवार थामे हुए है।