शाहजहांपुर। आज भले ही समय देखने के तमाम साधन मौजूद हों, मगर पहले सूर्य, तारों और चांद की स्थिति ही समय देखने का साधन थी। करीब सौ साल पहले स्थापित की गईं सौर घड़ियों से वर्तमान में लोग समय नहीं देखते हैं, लेकिन पूर्वजों की दूरदर्शिता और खगोलविद्या के ज्ञान का परिचायक हैं। शहर में जामा मस्जिद और सिंधौली के महासिर गांव में सूर्य घड़ी लगी है। ये घड़ियां अब भी सटीक समय बताती हैं।
एसएस कॉलेज के इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. विकास खुराना ने बताया कि शाहजहांपुर में करीब सौ वर्ष पूर्व की दो सूर्य घड़ीधरोहर हैं। हालांकि इनका विज्ञान अब कम लोग ही जानते हैं। इसमें से एक जामा मस्जिद की सौर घड़ी है जो उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में नमाज का वक्त देखने के लिए लगाई गई थी। दूसरी सौर घड़ी सिंधौली के महासिर गांव के शारदा नहर ब्रांच पर स्थापित की गई थी। वर्ष 1929 में नहर का काम कर रहे श्रमिकों के काम के घंटे तय करने के लिए यह घड़ी लगाई गई थी। जामा मस्जिद में चंद्र घड़ी भी सौर घड़ी के साथ ही चिह्नित है।
ऐसे काम करती है सूर्य घड़ी
एक चबूतरा बना कर इन घड़ियों को स्थापित किया गया है। जहां जामा मस्जिद की घड़ी कंक्रीट और सीमेंट की बनी है, वहीं शारदा बैराज की घड़ी धातु की बनी हुई है। इनके नीचे ही कोण के माध्यम से नंबर उत्कीर्ण हैं। यह प्लेट चौबीस बराबर खंड में बंटी होती है, जिन्हें जीवा कहते है। इनमें से प्रत्येक का कोण 3.75 डिग्री होता है। इसी कोण में प्लेट के ऊपर एक तिकोनी प्लेट और लगाई जाती है जिसे नोमोन कहा जाता है। दिन में जैसे-जैसे सूर्य पूर्व से पश्चिम की ओर बढ़ता है, खड़ी प्लेट की छाया पश्चिम से पूर्व की ओर बढ़ती जाती है। यह छाया सतह पर बने कोण पर पड़ती है। इससे दिन के समय घंटों का पता चलता है।
काफी सटीक है समय
समय की विश्वनीयता सिद्ध करने के लिए धूप घड़ी को पृथ्वी की परिक्रमा की धुरी की सीध में लगाया जाता है। क्योंकि भारत की समय रेखा नैनी प्रयागराज के पास से होकर गुजरी है। पूरे भारत के लिए एक ही मानक समय रखा गया है। हमारी घड़ियों से इन सूर्य घड़ियों द्वारा बताए गए समय में कुछ मिनट का अंतर होता है। निश्चित ही सूर्य घड़ियों द्वारा बताया गया समय ज्यादा सही और विश्वसनीय है।
सूर्योदय तथा सूर्यास्त के मध्य का समय सवाना है। सावन माह के 30 दिन एक सवाना मास बनाते हैं। ऐसे बारह मास मिलकर एक सौर वर्ष पूर्ण करते हैं। सूर्य घड़ियां हमारी सांस्कृतिक, दार्शनिक धरोहर हैं। इनका संरक्षण किया जाना बेहद जरूरी है। -डॉ. विकास खुराना, इतिहास विभागाध्यक्ष एसएस कॉलेज।
महासिर गांव के पास शारदा बैराज की मेटल सौर घड़ी।- फोटो : SHAHJAHANPUR