शाहजहांपुर। मतभेदों के कारण दरकते रिश्तों के मामले कुटुंब (परिवार) न्यायालयों में लगातार बढ़ रहे हैं। अदालत के आदेश पर पीड़िताओं को गुजारा भत्ता देने का प्रावधान है। लेकिन ऐसी बहुत सी महिलाएं हैं, जिन्हें गुजारा भत्ता देने के लिए अदालत से आदेश हो गए हैं, लेकिन फिर भी उनके हाथ कुछ नहीं लगा। कई मामले पांच से सात साल पुराने हो गए हैं। परिवार न्यायालय में ऐसे 1200 से अधिक मामले हैं, जिनमें अदालत के आदेश के बावजूद पीड़ित महिलाओं को गुजारा भत्ता नहीं मिल रहा है। उन्हें तारीख पर अदालत में पेश होना पड़ता है। इसके अलावा परिवार न्यायालय में गुजारा भत्ते के लगभग 3000 मामले लंबित भी हैं।
केस-1
अरुणा देवी की शादी जनपद हरदोई के रजनीश से 2011 को हुई थी। साल 2013 में अरुणा ने पति से गुजारा भत्ते के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया। 2022 में अदालत ने चार हजार रुपये गुजारा भत्ता देने का आदेश कर दिया, लेकिन आज तक अरुणा को एक पैसा तक नहीं मिला।
केस - 2
निगोही की रहने वाली विमला देवी का विवाह ग्राम परिहर थाना शाहबाद जिला हरदोई निवासी अमित कुमार के साथ हुआ था। साल 2020 में न्यायालय ने पीड़िता को तीन हजार रुपये गुजारा भत्ता देने का आदेश उसके पति अमित कुमार को दिया। भत्ते के लिए विमला दो साल से अदालत के चक्कर लगा रही हैं।
केस - 3
थाना तिलहर के गांव पिंगरी पिंगरा निवासी अनीता देवी की शादी मदनापुर निवासी रविंदर के साथ हुई थी। अनीता देवी की ओर से साल 2017 में मुकदमा परिवार न्यायालय में दर्ज कराया था। साल 2018 में परिवार न्यायालय से गुजारा भत्ता बंधा था। उसे भी भत्ता नहीं मिल सका है।
इसलिए होती है देर
अधिवक्ता रमाकांत मिश्रा ने बताया कि पीड़ित महिला की गुजारा भत्ते के लिए दाखिल अर्जी पर लंबी बहस के बाद फैसला होता है। इसमें दो से तीन साल लग जाते हैं। फैसला महिला के पक्ष में हो तो उसके पति को उसे अर्जी दाखिल करने की तारीख से ही गुजारा भत्ता देना पड़ता है। आमतौर पर पति के वकील गुजारा भत्ता के आदेश की अर्जी दाखिल करने और फैसला सुनाने की तारीख से लागू करने के बीच मामले को उलझा देते हैं। पीड़ित महिला को एक महीने में न्यायालय में अर्जी दाखिल करने की तारीख से गुजारा भत्ता दिलाने के लिए अपील दायर करनी होती है। अपील पर फैसला सुनाने में भी आमतौर पर छह महीने लग जाते हैं। फिर भी गुजारा भत्ता नहीं मिलता है तो महिला को फिर अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। इसके बाद अदालत उसके पति को तलब करती है। अदालत में पेश न होने पर उसके खिलाफ वारंट जारी किया जाता है। इस प्रक्रिया में भी काफी समय लग जाता है।
यह भी वजह
अदालत में केसों की भरमार और न्यायाधीशों की कमी, पैरवी की कमी के कारण केसों में लंबी तारीखें दी जाती हैं। हालांकि इस समस्या के समाधान के लिए परिवार न्यायालय को विस्तार दिया गया है।
-3000 मामले परिवार न्यायालय में लंबित हैं।
-1200 मामलों में गुजारा भत्ता नहीं मिल रहा।
-400 मामलों में गुजारा भत्ता लगातार मिल रहा है।
-800 नए केस दायरे में हैं।
-आठ से 10 गिरफ्तारी रोजाना गुजारा भत्ता के संबंध में होती हैं।