शाहजहांपुर। दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद समान नागरिक संहिता पर फिर से बहस छिड़ गई है। एक बड़ा वर्ग मानता है कि पूरे देश में सभी के लिए एक समान संहिता होनी चाहिए वहीं शेष लोग मौजूदा सिस्टम को ही चलाए जाने के पक्ष में हैं। समान नागरिक संहिता की मांग लंबे समय से उठती रही है। दोनों पक्षों के पास अपने-अपने तर्क हैं।
हम कोर्ट का सम्मान करते हैं। किसी भी मजहब के पर्सनल लॉ के अंदर हस्तक्षेप को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है। भारत में तमाम धर्म और जातियों के लोग रहते हैं। जिनकी भाषा अलग-अलग है तो उनके ऊपर एक कानून कैसे लागू किया जा सकता है। भारत में अनेकता में एकता ही इसकी खूबसूरती है। -सैय्यद रिजवान अहमद
भारत का संविधान बाबा भीमराव आंबेडकर ने लिखा है। समान नागरिक संहिता लागू करने का मतलब है बाबा आंबेडकर द्वारा बनाए गए कानून को खत्म करना। देश की भिन्नताओं को समान नागरिक संहिता को लागू करके कैसे समेट पाएंगे। समान नागरिक संहिता को स्वीकार नहीं किया जा सकता है। - सैय्यद नोमान
समान नागरिक संहिता को लोगों की भावनाओं की कद्र करते हुए लागू करना चाहिए। वह कानून सर्वमान्य होता है, जो लोगों के दिलों में वास करता है। सरकारों व न्यायपालिका को कोशिश करनी चाहिए कि किसी की भावनाएं आहत न हों। कृषि कानून लाया गया, लेकिन किसानों को ही उसके मायने नहीं समझा सके। जबकि वह उनके हित में है। उसी तरह से समान नागरिक संहिता को लागू करने के लिए हाईकोर्ट ने कहा है, तो उसका सम्मान होना चाहिए। - डॉ. रवि मोहन
देश के सभी नागरिकों के लिए एक जैसा कानून लागू करने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट ने सिफारिश की है। जिसका सभी को सम्मान करना चाहिए। इस कानून के लागू होने के बाद देश में सभी को समान अधिकार प्राप्त होंगे। प्रॉपर्टी, शादी, तलाक और उत्तराधिकार जैसे मामलों में अलग-अलग कानून नहीं चलेगा। इसलिए हाईकोर्ट की सिफारिश को मानते हुए देश में समान नागरिक संहिता को लागू किया जाए, इसकी जरूरत और सही समय है। - कृष्ण कुमार सक्सेना, वरिष्ठ अधिवक्ता