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कारगिल विजय दिवस : रमेश चंद्र की शहादत ने बढ़ाया शहीद नगरी का मान

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शाहजहांपुर। शाहजहांपुर को यूं ही शहीदों की नगरी नहीं कहा जाता है। आजादी से पहले जहां ठाकुर रोशन सिंह, पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां आदि ने शहादत दी। स्वतंत्रता के बाद भी देश की रक्षा में कई सैनिक अपनी जान की कुर्बानी दे चुके हैं। 1999 के कारगिल युद्घ में काबिलपुर गांव निवासी रमेश चंद्र बहादुरी से लड़े और अपनी शहादत देकर जिले का सिर गर्व से ऊंचा किया।
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मदनापुर के काबिलपुर गांव में 20 अक्टूबर 1971 को पैदा हुए रमेशचंद्र ने महज 28 साल की उम्र में देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। मां सुशीला देवी और पिता चतुरीलाल के घर जन्मे रमेश चंद्र की शुरुआती शिक्षा गांव बरखेड़ा के प्राथमिक विद्यालय में हुई। इसके बाद मदनापुर के उच्च प्राथमिक विद्यालय से कक्षा आठ तक की शिक्षा प्राप्त करने के बाद तिलहर के एलबीजेपी इंटर कॉलेज में प्रवेश लिया। 17 अक्टूबर 1996 को सुरेश चंद्र जाट रेजीमेंट में बतौर सिपाही भर्ती हो गए। महज तीन साल बाद जब कारगिल में पाकिस्तान की सेना ने घुसपैठ की तो वह अग्रिम मोर्चे पर तैनात कर दिए गए। युद्घ में 12 जून 1999 को बहादुरी से लड़ते हुए वह शहीद हो गए। शहादत के कुछ दिन पहले ही उनकी पत्नी सुनीता देवी ने बेटे को जन्म दिया था जिसका चेहरा भी रमेश नहीं देख सके थे। उनकी शहादत पर पूरा गांव रोया लेकिन सभी को फख्र था कि देश जब संकट में था तो रमेश चंद्र ने आगे बढ़कर अपनी कुर्बानी देकर रक्षा की।
बरेली में रहकर बच्चों को पढ़ा रहीं शहीद की पत्नी
शहीद रमेश चंद्र की पत्नी सुनीता वर्तमान में बरेली में पांच बच्चों अशोक, आशीष, रोली, सोनी और मोनी के साथ रह रही हैं। बच्चे आर्मी स्कूल में पढ़ रहे हैं। रमेश चंद्र का भतीजा सर्वेश गांव के प्रधान रह चुके हैं। शहादत के बाद सरकार ने उनके परिवार को पेट्रोल पंप व अन्य सरकारी सहायता उपलब्ध कराईं। पेंशन के साथ ही गांव के बाहर स्मारक बनवाया। गांव के संपर्क मार्ग का नाम शहीद रमेश चंद्र मार्ग कर दिया। शहीद का परिवार सरकार की ओर से दी गईं सुविधाओं से संतुष्ट है। शाहजहांपुर शहर में आवास विकास कॉलोनी में बने पार्क में उनकी प्रतिमा लगवाई गई है।
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