जलालाबाद। जलालाबाद की धरती से अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल फूंकने वाले अहमद यार खां का बृहस्पतिवार को 174वां शहीद दिवस है। देश को आजादी दिलाने वाले शहीदों की शहादत इतिहास के पन्नों में दर्ज है। उनकी मजार अब भी उपेक्षित है।
विख्यात इतिहासकार डॉ. एनसी मेहरोत्रा अपनी पुस्तक शाहजहांपुर : ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर में लिखते हैं कि जलालाबाद में अहमद यार खां 1857 की क्रांति के प्रमुख नायक थे। 23 जून 1857 को जब गुलाम कादिर खां शहर नाजिम बनकर आए तो अहमद यार खां ने उनसे खुद को जलालाबाद का तहसीलदार बनाए रखने की अपील की जो स्वीकार हो गई। एक माह बाद अहमद यार खां ने बरेली जाकर खान बहादुर खान को नजराना पेश किया और जलालाबाद का नाजिम बनाने की प्रार्थना की।
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अंग्रेजों के विरुद्ध बिचपुरिया युद्ध में अहमद यार खां ने भाग लिया। 26 अप्रैल 1858 को ब्रिटिश सेनाओं ने कैंपबेल के नेतृत्व में जलालाबाद में प्रवेश किया। अहमद यार खां ने मजबूरी में आत्मसमर्पण किया। उन पर देशद्रोह, आतंकवाद का आरोप लगाकर मात्र दो दिन में 28 अप्रैल को बारापत्थर नामक स्थान पर जनता के सामने सार्वजनिक रूप से फांसी की सजा दे दी।
कई वर्षों पहले शहीद अहमद यार खां के परिजन मुम्बई जाकर बस गए। यहां अब उनका कोई पारिवारिक सदस्य नहीं रहता। रामताल रोड पर स्थित उनकी मजार इस शहादत की मूक गवाह है। हालांकि मजार उपेक्षा की शिकार है। संवाद