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युवा पीढ़ी में घट रहा सेवा भाव

Wed, 02 Oct 2013 05:41 AM IST
Shahjahanpur
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पैसा कमाने की अंधी दौड़ वृद्घजनों की कर रही उपेक्षा
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- घर-परिवार वाले बुजुर्ग भी बिता रहे हैं एकाकी जीवन
अनूप वाजपेयी
शाहजहांपुर। कहीं पैसा कमाने की अंधी दौड़ तो कहीं जीवन यापन के लिए परदेस में नौकरी करने की मजबूरी बड़े-बुजुर्गों को उपेक्षा का दंश दे रही है। कारण जो भी हों, यह कटु सच्चाई है कि वृद्घजनों के प्रति युवा पीढ़ी में सेवा भाव लगातार घट रहा है। हालांकि, इसके बहुतेरे अपवाद भी मिल जाएंगे, लेकिन ऐसे खुशनसीबों की तुलना में उन बुजुर्गों की तादाद कहीं अधिक है जो जिंदगी के ढलान पर बहू-बेटों और नाती-पोतों से दूर एकाकी जीवन बिताने को मजबूर हैं।
बड़े शहरों, विशेषकर महानगरों में खुलने वाले वृद्घाश्रम और उनमें बुजुर्ग संवासियों की लगातार बढ़ रही संख्या उनकी उपेक्षा का जीवंत प्रमाण हैं। इस बात पर तसल्ली की जा सकती है कि अभी अपने शहर में वृद्घाश्रम की संस्कृति नहीं पनपी, लेकिन इसी तथ्य को बुजुर्गों की यहां बेहतर सामाजिक स्थिति का पैमाना नहीं माना जा सकता। सच तो यह है कि तमाम खाते-पीते संपन्न परिवारों के मुखिया भी घरों की चहारदीवारी में रहकर परिवार से दूरी का अहसास कर रहे।
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ऐसे बुजुर्गों के मुंह पर ताला लगा है तो सिर्फ इसलिए कि घर की बात बाहर जाने से बहू-बेटे की बदनामी नहीं हो। बुजुर्गों की इसी मन:स्थिति को भांपते हुए कैंट बोर्ड ने छावनी एरिया में करीब डेढ़ साल पहले वृद्घाश्रम खोला जहां कुछ बुजुर्ग दिन में मन बहलाने पहुंचते हैं। इसके बावजूद महानगरीय हाई-फाई सोसाइटी के रंग में यहां के युवा भी रंगने लगे हैं। वृद्घ माता-पिता की देखभाल न करने वाले बेटों को कानून के दायरे में लाए जाने के बावजूद बुजुर्गों की उपेक्षा में कोई कमी नहीं आई। अंतर्राष्ट्रीय वृद्घजन दिवस पर आइए मिलते हैं ऐसे ही कुछ उपेक्षित बुजुर्गों से।


सरकार नहीं करती बुजुर्गों की सुनवाई
ये हैं मिर्जापुर कसबे के नत्थू लाल। उम्र के लिहाज से 90 पार कर चुके, लेकिन समाज चैन से नहीं बैठने रहा। कलक्ट्रेट में चेहरे पर उदासी ओढ़े बैठे मिले। आने का सबब पूछा तो दिल का दर्द आंखों से बहकर उम्र की लकीरों के रास्ते ठोड़ी से टपकने लगा। तसल्ली दी तो थोड़ा संयत होकर बोले कि पट्टे पर मिले प्लाट पर 40 साल तक एक-एक ईंट जोड़कर मकान बनाया, लेकिन उस पर ‘आतंकी’ किस्म के लोग कब्जा कर रहे हैं। डीएम-एसपी से मिले और हाथ जोड़े, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं। सरकार भी नहीं सुन रही। सब ऐसे सुलूक कर रहे कि जैसे उन पर कभी बुढ़ापा आएगी ही नहीं।



बहू की उपेक्षा ने सन्यास को किया मजबूर
सेहरामऊ दक्षिणी क्षेत्र के गांव आटा गौरिया निवासी 70 वर्षीय चमेली देवी का कुनबा आर्थिक रूप से भले ही संपन्न नहीं हो, दो जून की रोटी को लेकर कोई समस्या नहीं। इसके बावजूद पुत्रवधू की उपेक्षा ने सन्यास लेने को मजबूर कर दिया। दिन में मंदिरों-गुरुद्वारों के बाहर बैठकर दो रोटी की खातिर लाइन में लगना और दिन ढलने के बाद रेलवे प्लेटफॉर्म पर रात बिताना उनकी दिनचर्या है। कलक्ट्रेट के बरामदे में पोटली पर सिर धरे दीन-दुनियां से बेखबर चमेली को जगाया तो उनकी पीड़ा उजागर हुई। बोलीं कि बेटा राजेश उन्हें साथ रखने को राजी है, लेकिन बहू निभाने को तैयार नहीं।


घरवालों के बीच दम निकलने की हसरत
इनका नाम है बशीरुद्दीन। हरदोई जिले के सांडी कसबा के रहने वाले हैं। सत्तर पार कर चुकने के बावजूद पेट की खातिर शहर में फुटपाथों पर बैठकर बीड़ी-सिगरेट और गुटखा बेंचते दिख जाते हैं। आज कचहरी तिराहे पर पीडब्ल्यूडी गेस्ट हाउस के पास आज फिर दुकान सजाए बैठे मिल गए। पूछा कि यहां कैसे? पहले तो बोलने में सकुचाए, लेकिन ‘बाबा’ के संबोधन से आत्मीयता मिली तो मुखर हुए। बताया कि चार बेटों और पोतों का भरा-पूरा परिवार है, लेकिन उन्होंने मकान की फर्जी वसीयत अपने नाम कराकर काफी पहले घर से निकाल दिया। उम्र के साथ यह हसरत भी बढ़ रही कि घरवालों के बीच आखिरी सांस निकले।
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डे रेस्टर से मिल रहा
बुजुर्गों को मनोरंजन
‘छावनी परिषद ने वृद्घाश्रम नहीं, डे रेस्टर खोला है जिसमें कैंट एरिया के बुजुर्गों को मनोरंजन और मन बहलाव के साधन उपलब्ध कराए गए हैं। उनके लिए कैेरम, ताश, मैगजीन, अखबार आदि सुलभ कराए जाते हैं। इन दिनों 25-30 बुजुर्ग रोजाना सुबह-शाम हम उम्रों से बतियाने और खाली समय व्यतीत करने आते हैं।’
- एमपीआर त्रिपाठी, सीईओ, कैंट बोर्ड
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