अगर आप प्रोटीन और विटामिन ई की शरीर में पूर्ति में लिए मछली खाने के शौकीन हैं तो बड़े आकार वाली थाई मांगुर से थोड़ा फासला बनाए रखिए। स्वाद के लिए जरा सी असावधानी बरतने पर मछली की यह प्रजाति हृदय रोग, डायबिटीज, आर्थराइटिस जैसे वंशानुगत रोगों को बढ़ावा दे सकती है। चिकित्सा विज्ञान के शोधों में थाई मांगुर को जेनेटिक रोगों का वाहक पाए जाने पर दुनियां के कई देशों में इस प्रजाति के मत्स्य पालन को प्रतिबंधित किया जा चुका है, लेकिन कम समय में अधिक मुनाफा पाने केे लालच में मत्स्य पालक जिले के तालाबों में इसका कुनबा तेजी से बढ़ा रहे हैं। मत्स्य पालन केे लिहाज से जिले की आबोहवा हमेशा अनुकूल रही है। नदियों की बहुतायत वाली जलालाबाद और कलान तहसील को अपवाद मानें तो सदर, तिलहर और पुवायां तहसील के विकास खंड मछली पालन के लिए तालाबों-पोखरों से हमेशा समृद्ध रहे हैं। हालांकि, गत दो दशक के दौरान आबादी बढ़ने पर मकान बनाने को सरकारी भूखंडों की तरह तालाबों को पाटकर उन पर कब्जा करने की बढ़ी हवस ने मत्स्य पालन का रकबा घटा दिया है। इसके बावजूद जो तालाब बचे रह गए हैं, उनकेे लिए पर्याप्त मत्स्य पालक नहीं मिल रहे।
इसलिए थाई मांगुर के प्रति मत्स्य पालकों का बढ़ा रुझान
मत्स्य विभाग के अधिकारी भी मानते हैं कि जो मत्स्य पालक तालाबों का पट्टा ले रहे हैं, उनका थाई मांगुर के उत्पादन में बढ़ता रुझान भविष्य के लिए खतरे की घंटी बजा रहा है। उनका कहना है कि छोटे आकार वाली देशी मांगुर तैयार होने मेें करीब तीन-चार माह का समय लगता है जबकि थाई मांगुर डेढ़-दो माह के अंतराल में दोगुने आकार की हो जाने से बाजार में भेजने लायक हो जाती है। थाई मांगुर प्रतिबंधित होने के कारण उसका बीज भी मछली की अन्य प्रजातियों की तुलना में सस्ती दरों पर मिल जाता है। मत्स्य पालकों को सिर्फ लागत और वजन से सरोकार रहता है। यही वजह है कि जिले मेें थाई मांगुर प्रजाति तेजी से पनप रही है। इस तरह कोई शिकायत मिलने पर विभागीय निरीक्षक तालाबों का निरीक्षण करते हैं तो मत्स्य पालक उनसे दबंगई दिखाने पर आमादा हो जाते हैं।
तालाबों की पारिस्थितिकी के अनुरूप होता है मत्स्य पालन
प्रदेश सरकार ने मछली पालन के लिए रोहू, कतला, नैन, ग्रास कार्प, चायनीज अर्थात कॉमन कार्प, सिल्वर कार्प, देशी मांगुर आदि प्रजातियों को स्वीकृति दी है। किस क्षेत्र के तालाब मेें किन प्रजातियों की मछलियां पाली जानी हैं, यह तालाबों की परिस्थिति पर निर्भर करता है। मसलन, तालाब छोटा और उथला है तो उसमें कॉमन कार्प और सिल्वर कार्प का बीज डालने की संस्तुति की जाती है। इन प्रजातियों की मछलियां अमूमन तलहटी अर्थात सरफेस लेयर मेें उपलब्ध शैवाल को भोजन बनाकर अपना विकास करती हैं। एक बीघा और इससे कम रकबा वाले तालाबों को मत्स्य पालन केे अनुकूल नहीं माना जाता, लेकिन जिले मेें छोटे तालाबों की संख्या अधिक होने से मत्स्य पालक इन प्रजातियों को हाथों-हाथ ले रहे हैं।
तीन सतहों पर विकसित होती हैं विभिन्न प्रजातियां
मत्स्य पालन के लिए तालाब को मुख्यत: तीन सतहों में विभाजित कर उसी के अनुरूप विभिन्न प्रजातियों का बीज डाला जाता है। अपर लेयर अर्थात ऊपरी सतह ग्रास कार्प और नैन प्रजातियों के अनुकूल मानी जाती है जबकि तालाब में भरे पानी की मध्य सतह (मिडिल लेयर) सतह में रोहू और कतला विकसित होती हैं। कॉमन कार्प और चांदी जैसी चमकीली सिल्वर कॉर्प तालाब की तलहटी मेें अपना जीवन चक्र विकसित करती है। जलकुंभी से आच्छादित तालाबों में ग्रास कार्प लाभकारी सिद्ध होती है क्योंकि यह प्रजाति जलकुंभी को अपना निवाला बनाकर उसका सफाया करने में सक्षम है।