संभल। गन्ना किसानों को पर्चियां कम मिल रही हैं। जिससे खेत खाली नहीं हो पा रहे हैं। इससे न सिर्फ रबी की फसलों की बुवाई पिछड़ रही है बल्कि किसानों को आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ रहा है। किसानों का कहना है कि पर्चियां कम आने से गन्ने के खेत खाली होने में देरी हो रही है। जिसके चलते गेहूं की बुवाई देरी से होगी तो उत्पादन पर विपरीत असर पड़ सकता है।
जिले में अधिकांश किसान गन्ने की फसल को काटकर गेहूं सहित अन्य रबी फसलों की बुवाई करते हैं। किसान अपने गन्ने की सप्लाई मिलों में करते हैं ताकि सरकारी मूल्य मिल सके। जिले में चल रही तीन चीनी मिलों की पेराई क्षमता 2.10 लाख टीसीडी (टन केपेसिटी डेली) है लेकिन शुगर मिलें अपनी क्षमता से पेराई कर नहीं पा रही हैं। इसकी वजह इंडेंट प्रभावित हो रहा है। जिससे पर्चियों में देरी हो रही है।
किसानों का कहना है कि कम पर्चियां आने से उनके सामने खेत खाली करने की समस्या है। जिसके चलते गेहूं की बुवाई पिछड़ रही है। आमतौर पर 15 दिसंबर तक गेहूूं की बुवाई करना बेहतर माना जाता है। बुवाई में देरी होनेे से गेहूं के उत्पादन पर असर पड़ता है। पछेती फसल में किसानों को न सिर्फ लागत अधिक लगानी पड़ती है बल्कि उत्पादन भी अपेक्षाकृत कम होता है।
पंद्रह बीघा से अधिक भूमि में गन्ने की फसल उगाई है। मिल जब चला तो एक पर्ची आई थी, लेकिन अब एक माह बीत गया है दूसरी पर्ची अब तक नहीं आई है। जिससे गन्ना खेत में ही सूख रहा है। कहीं कोई सुनवाई नहीं है। इससे गेहूूं की बुवाई प्रभावित हो रही है।
राजेंद्र पाल, गन्ना किसान, शफातनगर
मिल कम इंडेंट जारी कर रहा है। जिसके चलते पर्चियां कम आ रही हैं। खेत खाली नहीं हो रहे हैं। जिसके चलते गेहूं की बुवाई पिछड़ती नजर आ रही है। बुवाई पछेती हुई तो गेहूं का उत्पादन अपेक्षाकृत कम होगा। जिससे दोहरा नुकसान उठाना पड़ेगा।
कल्यान सिंह, गन्ना किसान, शफातनगर
गन्ने की फसल तैयार है। जब से मिल चालू हुआ है तब से पर्ची आने का इंतजार कर रहे हैं लेकिन पर्ची नहीं मिल रही है। कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है। गेहूं की फसल की भी बुवाई नहीं कर पा रहे हैं।
सुरेंद्र सिंह, गन्ना किसान, शफातनगर
देरी से बुवाई में डेढ़ से दो क्विंटल तक घट जाता है उत्पादन
संभल। कृषि विज्ञान केंद्र पत्था के प्रभारी अधिकारी महावीर सिंह ने बताया कि एक नवंबर से तीस नवंबर तक बुवाई से बेहतर उपज मिलती है। दस दिसंबर तक यह मध्यम रहता है, लेकिन बीस दिसंबर से उत्पादन पर काफी असर पड़ने लगता है। एक हेक्टेयर में यदि एक भी दिन बुवाई देरी से हुई तो एक से डेढ़ क्विंटल का उत्पादन घटता है।