भारत के अंतिम हिंदू सम्राट पृथ्वीराज चौहान की बहुश्रुत संयोगिता हरण और विवाह से जुड़ा चक्की के पाट का वजूद खतरे में है। शहर के मुख्य बाजार में डाकखाना रोड पर टंगा ‘चक्की का पाट’ संभल की ऐतिहासिक धरोहर है।
उपेक्षा का आलम यह है कि चक्की का पाट कंपनियों के विज्ञापन बोर्ड के तौर पर इस्तेमाल हो रहा है। अगर उपेक्षा जारी रही तो पृथ्वीराज चौहान की यह निशानी हकीकत की धरती से मिटकर सिर्फ स्मृतियों में कैद होकर रह जाएगी।
सियासी तौर पर वीआईपी शहर होने के साथ-साथ संभल की धरती कई ऐतिहासिक धरोहरों की साक्षी है। विडंबना यह है कि इनकी ऐतिहासिकता और महत्व से यहीं के लोग बेखबर हैं। शासन-प्रशासन की बात तो दूर की है। पृथ्वी राज चौहान की चक्की के पाट को ही ले लीजिए एक हजार साल से पुरानी इस धरोहर का अस्तित्व संकट में है।
आए थे आल्हा-ऊदल और मलखानः ‘संभल महात्म्य’ पुस्तक के अनुसार करीब एक हजार वर्ष पूर्व राजा पृथ्वीराज चौहान कन्नौज नरेश जयचंद की पुत्री संयोगिता का हरण करके लाए थे। उसी समय जयचंद की सेना के वीर योद्धा आल्हा, ऊदल और मलखान सिंह अपना वेष बदलकर नट की वेषभूषा में संयोगिता का पता लगाने संभल आए थे।
डाकखाना रोड पर कोटपूर्वी मुहल्ले में आज जहां चक्की पाट है, वहां एक किला था, जिसमें एक खिड़की थी, नट की वेषभूषा वाले आल्हा ने खिड़की से झांकने के लिए कला का प्रदर्शन करते हुए पहले वहां एक छलांग लगाकर कील ठोंकी और फिर वहां चक्की का पाट टांगा। उस समय इसकी ऊंचाई साठ फुट थी।
मुख्य उद्देश्य खिड़की से यह देखना था कि संयोगिता किले में है या नहीं। बताते हैं कि संयोगिता का पता चल गया, जिसके लिए बाद में पृथ्वीराज चौहान से युद्ध हुआ। इसी समय यह शाही एलान किया गया कि अब कोई नट संभल में कला का प्रदर्शन नहीं करेगा यदि करेगा तो उसे पहले एक ही छलांग में इस चक्की के पाट को उतारना होगा। परंपरानुसार आज भी कोई नट संभल में अपनी कला का प्रदर्शन नहीं करता।