जागे व्यवस्था तो बढ़े सहारनपुर में पर्यटन
सहारनपुर। सिद्धपीठ मां शाकंभरी देवी मंदिर के साथ ही जिले में कई महत्वपूर्ण स्थान हैं, जो विश्व पर्यटन के नक्शे पर लाए जाने जरूरी हैं। क्योंकि इन्हीं के दम पर जिले की पहचान विश्व में बनेगी तो पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा। समय-समय पर घोषणाएं तो होती रही हैं, लेकिन अमल नहीं हो पा रहा है। यदि व्यवस्था जागृत अवस्था में आ जाए तो पर्यटन क्षेत्र को बढ़ावा मिल सकता है।
विश्व पर्यटन दिवस 27 सितंबर को है। ऐतिहासिक महत्व के इस शहर में विश्व पर्यटन दिवस को लेकर सरकारी खानापूर्ति के लिए पर्यटन दिवस मनाया जाएगा। पर हकीकत ये है कि महाभारत और मुगलकालीन धरोहर को अपनी गोद में समेटे रखने वाले सहारनपुर जनपद के करीब 10 से अधिक स्थल अब भी पर्यटन के नक्शे पर आने को सरकार का मुंह ताक रहे हैं। महाभारत और मुगलकालीन धरोहर की बात करें तो जिले के नकुलेश्वर महादेव मंदिर, नकुड़, देवीकुंड मंदिर देवबंद, पांडवों का तालाब सौराना, पांच पांव तालाब रणखंड़ी देवबंद, गंगोह में हुमायूं के किले में बनी जेल, बादशाही मस्जिद आदि ऐसे कई स्थल हैं, जिन्हें पर्यटन के तौर पर विकसित करके सहारनपुर जनपद को एक नई पहचान दे सकते हैैं।
ऐतिहासिक धरोहर तक पर्यटन के नक्शे से गायब
फुलवारी वाटिका का बेहद महत्व है। शहरवासी इस वाटिका के बारे में कहते हैं कि इसमें शहीद भगत सिंह ठहरे थे। बल्कि वे दंगल भी खेले थे। उनकी यादों को संजोए रखते हुए दंगल तो आज भी खेलते हैं, पर पर्यटन के नक्शे पर ये कदम रख देता तो शायद ये वाटिका विश्वविख्यात हो जाती। रोहिला वंश शहर के बीच में है। यहां एक बड़ा किला है। पर्यटन विभाग ने इसे भी नजरअंदाज किया। अब यहां जेल संचालित हो रही है।
बाबा लालदास का बाड़ा भी है प्रमुख केंद्र
मां गंगा के परम भक्त थे बाबा लालदास। दिन-रात मां का गुणगान करते थे। किदवंती है कि उस वक्त किसी ने बाबा लालदास से कहा कि आप मां की भक्ति करते हो, गंगा स्नान को इतनी दूर जाते हो, वाकई मां गंगा के सच्चे भक्त हो तो यहीं गंगा की धारा क्यों नहीं निकलवा देते। इसके बाद चमत्कार हुआ और शकलापुरी के निकट भूगर्भ से एक धारा फूटी और बाबा लालदास के बाड़े तक पहुंच गई और यही धारा शहर के बीच से गुजरी, जिसे आज पांवधोई नदी के रूप में जाना जाता है।
बदहाल है शाहजहां की विरासत
मुगल बादशाह शाहजहां की निशानी के रूप में 1627-1658 के दौरान शाही शिकारगाह के लिए शिवालिक वन प्रभाग में इसका निर्माण कराया गया था। वर्तमान में यह काफी सिमटकर रह गया है। इमारत में कई कक्षों के अवशेष हैं। पुरातत्व विभाग की टीम इसको संरक्षित करने के प्रयास में भी जुटी थी, लेकिन बाद में मामला ठंडे बस्ते में चला गया।
संरक्षित स्मारक का लगा है बोर्ड, पर संचालित है जेल
देहरादून रोड पर जहां पर जिला कारागार का संचालन हो रहा है, वह रोहिला वंश का प्राचीन किला है। इसे पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित स्मारक भी घोषित किया जा चुका है। लेकिन पूर्व में इसको विवाद होने पर मामला न्यायालय में विचाराधीन है, जिस कारण संरक्षित स्मारक होने के बावजूद यह पर्यटन के लिए नहीं खुल पाया है।
रोहिला वंश का प्राचीन किला, जिसमें संचालित है जिला कारागार- फोटो : SAHARANPUR
रोहिला वंश का प्राचीन किला, जिसमें संचालित है जिला कारागार- फोटो : SAHARANPUR
पांवधोई नदी- फोटो : SAHARANPUR